पार्टी में सबसे बड़े, अपने ही गढ़ में पड़ गए छोटे!
Himachalnow / श्री रेणुका जी
रेणुका जी विधानसभा क्षेत्र में पंचायती राज चुनावों से पहले कांग्रेस के भीतर गुटबाजी, कार्यकर्ताओं की नाराजगी और विकास को लेकर उठ रहे सवालों ने राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया है। क्षेत्र में लंबे समय से मजबूत पकड़ रखने वाले कांग्रेस नेतृत्व को अब अपने ही गढ़ में चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, जबकि भाजपा लगातार गांव-गांव अपनी सक्रियता बढ़ा रही है।
संगड़ाह/रेणुका जी
प्रदेश कांग्रेस संगठन में सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिने जाने वाले श्री रेणुका जी विधानसभा क्षेत्र के मौजूदा विधायक के लिए इस बार पंचायती राज चुनाव सियासी चेतावनी बनते दिखाई दे रहे हैं। कभी कांग्रेस का अभेद्य गढ़ माने जाने वाले इस क्षेत्र में अब पार्टी के भीतर बढ़ती गुटबाजी, कार्यकर्ताओं की नाराजगी और विकास को लेकर उठते सवालों ने राजनीतिक माहौल पूरी तरह बदल दिया है।प्रदेश स्तर पर मजबूत पकड़ और सत्ता के शीर्ष तक सीधी पहुंच रखने वाले नेता के अपने ही क्षेत्र में अब कांग्रेस कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
गांवों में चर्चा है कि वर्षों से पार्टी के लिए जमीन पर संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं को अब केवल चुनावी मौसम में याद किया जाता है, जबकि निर्णय सीमित दायरे में ही तय हो रहे हैं।पंचायती चुनावों ने कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान को खुलकर सामने ला दिया है। कई स्थानों पर समर्थित प्रत्याशियों के नामांकन के दौरान बड़े नेता और प्रभावशाली चेहरे तक नजर नहीं आए। इससे कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश गया कि पार्टी अभी भी गुटीय राजनीति और अंदरूनी समीकरणों में उलझी हुई है।क्षेत्र में विकास को लेकर भी लोगों के बीच गहरी नाराजगी दिखाई दे रही है। पर्यटन और आस्था का बड़ा केंद्र होने के बावजूद रेणुका क्षेत्र आज भी बुनियादी सुविधाओं और ठोस परियोजनाओं की रफ्तार का इंतजार कर रहा है।
चूड़धार रोपवे जैसे मुद्दे वर्षों से राजनीतिक भाषणों का हिस्सा बने हुए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर तस्वीर अब भी अधूरी नजर आती है।मां रेणुका जी झील और अंतरराष्ट्रीय मेले को लेकर भी स्थानीय लोगों में असंतोष है। लोगों का कहना है कि मेले में वीआईपी संस्कृति तो लगातार बढ़ी, लेकिन क्षेत्र के युवाओं, व्यापारियों और पर्यटन ढांचे को उसका वास्तविक लाभ नहीं मिल पाया।दूसरी ओर भाजपा इस पूरे माहौल को मौके के रूप में भुनाने में जुटी दिखाई दे रही है। हरिपुरधार, नहरा धार और ददाहू जैसे क्षेत्रों में भाजपा ने स्थानीय और प्रभावशाली चेहरों पर दांव खेलकर चुनावी समीकरणों को दिलचस्प बना दिया है।
महिला प्रत्याशियों और जमीनी नेटवर्क के जरिए भाजपा गांवों में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।
क्षेत्र में स्वर्गीय डॉ. प्रेम की राजनीति की चर्चा भी एक बार फिर तेज हो गई है। पुराने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिस आत्मीयता, सहजता और कार्यकर्ताओं से सीधा जुड़ाव डॉ. प्रेम की पहचान था, वह मौजूदा नेतृत्व में दिखाई नहीं देता। यही कारण है कि कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक भी अब पहले जैसा उत्साहित नजर नहीं आ रहा।उधर भाजपा नेता नारायण सिंह लगातार गांव-गांव सक्रियता बनाए हुए हैं।
उनकी सादगी और लगातार जनसंपर्क का असर अब उन कार्यकर्ताओं पर भी दिखाई देने लगा है, जो वर्षों तक कांग्रेस की राजनीति से जुड़े रहे।राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यदि कांग्रेस ने समय रहते संगठनात्मक असंतोष और जमीनी नाराजगी को गंभीरता से नहीं लिया, तो पंचायती चुनाव आने वाले बड़े राजनीतिक बदलाव की भूमिका तैयार कर सकते हैं।फिलहाल रेणुका की राजनीति साफ संकेत दे रही है कि अब जनता केवल बड़े पद और राजनीतिक रसूख से प्रभावित होने वाली नहीं है। गांवों में अब चर्चा काम, पहुंच और जमीन पर दिखाई देने वाली सक्रियता की हो रही है। यही वजह है कि इस बार पंचायती रण में कांग्रेस का किला पहले से कहीं ज्यादा दबाव में दिखाई दे रहा है।