सुप्रीम कोर्ट ने धर्मशाला के न्यायिक अधिकारी की याचिका का किया निस्तारण, पदोन्नति मामले पर दी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी की पदोन्नति से संबंधित याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए उसका निस्तारण कर दिया। अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट कॉलेजियम को किसी प्रकार का न्यायिक निर्देश नहीं दिया जा सकता और याचिकाकर्ता अन्य उपलब्ध उपायों का उपयोग कर सकते हैं।
शिमला
पदोन्नति संबंधी मामले को लेकर दायर की गई थी याचिका
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हिमाचल प्रदेश के न्यायिक अधिकारी अरविंद मल्होत्रा की ओर से दायर रिट याचिका का निस्तारण कर दिया। याचिकाकर्ता इस समय धर्मशाला में फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने अपनी याचिका में हाई कोर्ट में पदोन्नति के लिए अपने नाम पर विचार किए जाने की मांग की थी। मामले में यह भी कहा गया कि उनके नाम पर पहले भी विचार की प्रक्रिया से जुड़ी कार्यवाही हुई थी, लेकिन अंतिम निर्णय नहीं हो सका।
कॉलेजियम को निर्देश देने से अदालत का इनकार
मामले की सुनवाई जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि हाई कोर्ट कॉलेजियम को किसी प्रकार का न्यायिक निर्देश जारी नहीं किया जा सकता। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि उपलब्ध रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता का नाम कॉलेजियम द्वारा औपचारिक रूप से अस्वीकार किया गया है। अदालत ने कहा कि पदोन्नति से जुड़ी प्रक्रिया संबंधित कॉलेजियम और प्रशासनिक व्यवस्था के तहत आगे बढ़ती है।
याचिकाकर्ता की ओर से रखा गया पक्ष
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता बलबीर सिंह ने दलील दी कि सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट कॉलेजियम को याचिकाकर्ता और एक अन्य न्यायिक अधिकारी के नामों पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया था। उन्होंने यह भी कहा कि सितंबर 2025 में याचिकाकर्ता को बातचीत के लिए बुलाया गया और कुछ दस्तावेज जमा करने को कहा गया था। इसके बाद मई में उनके जूनियर अधिकारियों के नाम पदोन्नति के लिए आगे बढ़ा दिए गए। याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क भी रखा गया कि दो मौजूदा रिक्तियों के लिए जूनियर अधिकारियों की सिफारिश की गई, जबकि उनके मामले पर अंतिम निर्णय लंबित रहा।
अदालत ने प्रतीक्षा करने की सलाह दी
पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता का नाम अभी तक अस्वीकार नहीं किया गया है और भविष्य में रिक्तियां उपलब्ध होने पर उनके मामले पर विचार किया जा सकता है। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता की सेवा अवधि में अभी लगभग दस वर्ष शेष हैं, इसलिए आगे अवसर उपलब्ध हो सकते हैं। सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ता को याचिका वापस लेने की सलाह भी दी और कहा कि संबंधित कॉलेजियम की प्रक्रिया पूरी होने तक प्रतीक्षा की जा सकती है।
याचिका का किया गया निस्तारण
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि वह अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका को आगे नहीं बढ़ाना चाहते। साथ ही प्रशासनिक पक्ष पर संबंधित प्राधिकारी से संपर्क करने अथवा अन्य उपलब्ध न्यायिक उपायों का उपयोग करने की अनुमति मांगी गई। अदालत ने याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता की इस बात को रिकॉर्ड पर लिया और इसके बाद याचिका का निस्तारण कर दिया।