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घर के अंदर कही गई जातिसूचक टिप्पणी एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं

हिमांचलनाउ डेस्क नाहन2 • 4 Hours Ago • 1 Min Read

सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए “पब्लिक व्यू” को अनिवार्य शर्त बताया। अदालत ने कहा कि निजी घर के अंदर कही गई जातिसूचक टिप्पणी कानून के तहत अपराध नहीं मानी जाएगी। इस फैसले को भविष्य के मामलों में महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है।

नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि जातिसूचक गालियां या अपमानजनक टिप्पणियां किसी निजी घर के भीतर और सार्वजनिक दृष्टि से दूर कही गई हों, तो ऐसे मामलों में एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं बनता।सर्वोच्च अदालत ने कहा कि इस कानून की धारा 3(1)(आर) और 3(1)(एस) के तहत मामला तभी बनता है, जब कथित अपमान या धमकी “पब्लिक व्यू” यानी आम लोगों की मौजूदगी या सार्वजनिक दृष्टि में हुई हो। अदालत ने इसे अपराध सिद्ध करने के लिए अनिवार्य कानूनी शर्त बताया।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया और न्यायमूर्ति पीके मिश्रा की पीठ ने की। यह मामला दिल्ली में पारिवारिक संपत्ति विवाद से जुड़ा था, जिसमें एक ही परिवार के चार सदस्यों के खिलाफ जातिसूचक गालियां देने और आपराधिक धमकी के आरोप में एफआईआर दर्ज हुई थी।रिपोर्ट के अनुसार विवाद दो भाइयों के बीच था, जो अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित हैं। आरोप लगाया गया था कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता के घर का ताला तोड़ने का प्रयास किया और घर के भीतर जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर अपमानित किया। निचली अदालत और दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोप तय करने के आदेश दिए थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन आदेशों को रद्द कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि एफआईआर में कहीं भी यह उल्लेख नहीं था कि कथित गाली-गलौज ऐसी जगह हुई, जहां आम लोग मौजूद थे या घटना को देख-सुन सकते थे। अदालत ने माना कि “पब्लिक व्यू” का तत्व अनुपस्थित होने के कारण आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून का दुरुपयोग होगा।पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई स्थान निजी हो, लेकिन वहां आम लोगों की पहुंच या दृश्यता संभव हो, तो उसे “पब्लिक व्यू” माना जा सकता है। हालांकि पूरी तरह निजी स्थान पर हुई कथित टिप्पणी स्वतः एससी-एसटी एक्ट के दायरे में नहीं आएगी।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य में एससी-एसटी एक्ट से जुड़े मामलों की सुनवाई में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जाएगा। इससे यह स्पष्ट होगा कि केवल आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि घटना की परिस्थितियों और सार्वजनिक मौजूदगी को साबित करना भी जरूरी होगा।

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