West Bengal / विपक्ष के नेता पद विवाद में ममता सरकार को झटका, हाई कोर्ट ने स्पीकर के फैसले में दखल से किया इनकार
West Bengal : कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता (एलओपी) के पद को लेकर दायर याचिका पर अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने फिलहाल विधानसभा अध्यक्ष के उस निर्णय पर रोक लगाने से मना किया है, जिसके तहत ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता नियुक्त किया गया था। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद स्पीकर का फैसला प्रभावी बना रहेगा और ऋतब्रत बनर्जी विपक्ष के नेता के रूप में कार्य करते रहेंगे।
कोलकाता
अंतरिम राहत देने से अदालत का इनकार
पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता (एलओपी) के पद को लेकर चल रहे विवाद में कलकत्ता हाईकोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड और प्रस्तुत दलीलों के आधार पर याचिकाकर्ता अंतरिम राहत के लिए प्रथम दृष्टया मामला स्थापित नहीं कर सके हैं। इसके साथ ही अदालत ने यह भी माना कि इस चरण में स्पीकर के निर्णय में हस्तक्षेप करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं बनता है। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद विधानसभा अध्यक्ष रथिन बसु द्वारा ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता नियुक्त करने का निर्णय फिलहाल प्रभावी रहेगा।
28 जुलाई को होगी अगली सुनवाई
मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस कृष्णा राव ने सभी पक्षों को अगली सुनवाई से पहले अपने-अपने हलफनामे और जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई निर्धारित की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अंतरिम राहत से इनकार किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि मामले के गुण-दोष पर अंतिम राय बना ली गई है। सभी पक्षों के दस्तावेज और तर्कों पर विचार करने के बाद आगामी सुनवाई में मामले की विस्तृत समीक्षा की जाएगी।
स्पीकर के फैसले को दी गई है चुनौती
यह याचिका विधानसभा अध्यक्ष रथिन बसु के उस निर्णय के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें ऋतब्रत बनर्जी को पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष का नेता नियुक्त किया गया था। तृणमूल कांग्रेस विधायक और याचिकाकर्ता शोवनदेब चट्टोपाध्याय ने अदालत से अनुरोध किया था कि स्पीकर के इस निर्णय पर अंतरिम रोक लगाई जाए। उनका तर्क था कि विपक्ष के नेता की नियुक्ति से संबंधित प्रक्रिया और दावों की न्यायिक समीक्षा आवश्यक है। हालांकि, अदालत ने फिलहाल इस मांग को स्वीकार नहीं किया।
सुनवाई के दौरान उठे प्रक्रिया संबंधी प्रश्न
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पीकर की ओर से पेश हुए पक्षकारों से यह स्पष्ट करने को कहा कि 9 मई को प्राप्त उस आवेदन पर कोई निर्णय क्यों नहीं लिया गया, जिसमें शोवनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाए जाने का दावा किया गया था। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि बाद में 3 जून को प्राप्त एक अन्य आवेदन पर कार्रवाई करते हुए ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता घोषित कर दिया गया। कोर्ट ने इस प्रक्रिया को लेकर स्पष्टीकरण मांगा और पूछा कि दोनों आवेदनों के साथ अलग-अलग व्यवहार किए जाने के पीछे क्या कारण थे।
विधानसभा चुनाव के बाद बदला राजनीतिक परिदृश्य
विधानसभा चुनावों के बाद तृणमूल कांग्रेस विधायक दल के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद सामने आए। पार्टी नेतृत्व ने वरिष्ठ नेता शोवनदेब चट्टोपाध्याय को विधायक दल का नेता बनाने का प्रस्ताव रखा था। दूसरी ओर, ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया कि उन्हें 58 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। इसी समर्थन के आधार पर उन्हें विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दिए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। बाद में पार्टी नेतृत्व और बागी माने जा रहे विधायकों के बीच मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आए, जिसके चलते यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया।
हस्ताक्षर विवाद की भी जांच जारी
विवाद के दौरान कुछ विधायकों ने आरोप लगाया कि विपक्ष के नेता के समर्थन से जुड़े कुछ दस्तावेजों पर उनके हस्ताक्षर वास्तविक नहीं थे और उनकी सहमति के बिना उनका उपयोग किया गया। इन आरोपों के बाद मामले की जांच शुरू की गई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, संबंधित दस्तावेजों और हस्ताक्षरों की सत्यता की जांच की जा रही है। जांच एजेंसियां विभिन्न पक्षों के बयान और दस्तावेजों का परीक्षण कर रही हैं ताकि तथ्यों की पुष्टि की जा सके। मामले से जुड़े आरोपों और दावों पर अंतिम निष्कर्ष जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।