ओरिसन फार्मा फिर कठघरे में, सीडीएससीओ की निगरानी पर उठे सवाल: बार-बार फेल हो रहे सैंपल तो आरबीआई आखिर किस काम का?
हिमाचल नाऊ न्यूज़ | नाहन
सिरमौर के काला अंब स्थित ओरिसन फार्मा इंटरनेशनल की दवा एक बार फिर गुणवत्ता जांच में फेल हो गई है। जुलाई 2026 के ड्रग अलर्ट में कंपनी की सीफिक्सिम डिस्पर्सिबल टैबलेट के सैंपल में टैबलेट की सतह पर हल्के भूरे रंग के धब्बे पाए गए। प्रयोगशाला जांच में सैंपल को निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं माना गया।
मामला सिर्फ एक दवा के सैंपल फेल होने का नहीं है। असली सवाल यह है कि यदि किसी फार्मा इकाई के उत्पाद बार-बार गुणवत्ता जांच में सवालों के घेरे में आ रहे हैं तो केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन और संबंधित राज्य ड्रग नियामक की निगरानी व्यवस्था आखिर कितनी प्रभावी है?
बार-बार सैंपल फेल, फिर भी निगरानी पर सवाल
रिकॉर्ड में कंपनी की अलग-अलग दवाओं के सैंपल अलग-अलग समय पर गुणवत्ता परीक्षण में असफल पाए जाने के मामले सामने आते रहे हैं। मई 2026 में कंपनी की सीफपोडॉक्सिम प्रॉक्सेटिल टैबलेट का सैंपल निर्धारित परीक्षणों में असफल पाया गया। नवंबर 2025 में पैंटोप्राजोल टैबलेट का सैंपल भी डिसॉल्यूशन परीक्षण में मानकों पर खरा नहीं उतरा था।
अब जुलाई 2026 में सीफिक्सिम टैबलेट की गुणवत्ता पर सवाल उठा है।
तो सवाल सीधा है—क्या हर बार एक सैंपल फेल होने के बाद संबंधित बैच पर कार्रवाई कर देना ही नियामकीय जिम्मेदारी की अंतिम सीमा है?यदि किसी कंपनी के एक से अधिक उत्पाद अलग-अलग समय पर गुणवत्ता कसौटी पर विफल हो रहे हैं तो क्या उसके पूरे उत्पादन तंत्र की विशेष जांच नहीं होनी चाहिए?
आरबीआई हो रहा है तो कमियां पकड़ी क्यों नहीं जा रहीं?
फार्मा उद्योगों में जोखिम आधारित निरीक्षण यानी आरबीआई का उद्देश्य ही यह है कि संभावित जोखिम वाले उत्पादन केंद्रों की गहन निगरानी की जाए। लेकिन जब निरीक्षण व्यवस्था मौजूद हो, गुणवत्ता नियंत्रण की पूरी प्रणाली मौजूद हो और उसके बाद बाजार में पहुंचने वाली दवा का सैंपल फेल हो जाए तो सबसे बड़ा सवाल इसी निगरानी तंत्र पर खड़ा होता है।
क्या आरबीआई केवल कागजी निरीक्षण बनकर रह गया है?
क्या निरीक्षण के दौरान उत्पादन लाइन, कच्चे माल, गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशाला, बैच रिकॉर्ड और अंतिम बैच रिलीज प्रक्रिया की उतनी ही गहराई से जांच होती है जितनी कागजों में दिखाई जाती है?और सबसे अहम—क्या जिन कंपनियों के सैंपल बार-बार फेल होते हैं, उनके लिए सामान्य निरीक्षण के बजाय विशेष निगरानी का कोई प्रभावी तंत्र है?
नारकोटिक्स विवाद का पुराना साया भी मौजूद
ओरिसन फार्मा का विवाद सिर्फ गुणवत्ता तक सीमित नहीं रहा है। कंपनी और उसके प्रमोटर्स का नाम ट्रामाडोल युक्त दवाओं के कथित अवैध डायवर्जन से जुड़े मामले में भी सामने आया था। काला अंब स्थित इकाई से बड़ी मात्रा में ट्रामाडोल टैबलेट और कच्चा माल जब्त किए जाने की कार्रवाई भी हुई थी।
कंपनी से जुड़े लोगों ने इस मामले में अदालत का दरवाजा खटखटाया था और हिमाचल हाई कोर्ट ने 2022 में अग्रिम जमानत प्रदान की थी। यह भी रिकॉर्ड का हिस्सा है कि संबंधित नारकोटिक्स उत्पादन लाइसेंस को लेकर बाद में नियामकीय कार्रवाई हुई और कंपनी की ओर से लाइसेंस सरेंडर किए जाने की बात सामने आई।
लेकिन नारकोटिक्स लाइसेंस छोड़ देने से दवा की गुणवत्ता का सवाल खत्म नहीं हो जाता।यही कारण है कि ताजा ड्रग अलर्ट को पुराने रिकॉर्ड की पृष्ठभूमि में देखना जरूरी हो जाता है।
सीडीएससीओ से जनता के नाम सीधे सवाल
अगर एक ही कंपनी की अलग-अलग दवाएं अलग-अलग समय पर गुणवत्ता परीक्षण में विफल हो रही हैं तो क्या कंपनी के गुणवत्ता नियंत्रण तंत्र का समग्र ऑडिट हुआ?क्या कंपनी की पिछली निरीक्षण रिपोर्टों की समीक्षा की गई?
क्या बार-बार फेल होने वाले सैंपलों के पैटर्न का विश्लेषण किया गया?क्या संबंधित इकाई को उच्च जोखिम वाली इकाई मानकर विशेष निगरानी में रखा गया?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या नियामक उस दिन का इंतजार कर रहा है जब किसी गंभीर बीमारी के इलाज के लिए मरीज द्वारा इस्तेमाल की गई दवा गुणवत्ता की कमी के कारण सवालों में आ जाए?सैंपल फेल होना सिर्फ कागज का आंकड़ा नहींड्रग अलर्ट में किसी दवा का सैंपल फेल होना महज एक सरकारी रिपोर्ट की एक पंक्ति नहीं है।
इसके पीछे वह मरीज है जो दवा की पैकिंग पर लिखी गुणवत्ता और प्रभावशीलता पर भरोसा करके उसे खरीदता है।इसलिए सवाल ओरिसन फार्मा से भी है और नियामक से भी।
कंपनी को बताना होगा कि ताजा फेल सैंपल के पीछे उत्पादन स्तर पर क्या कारण रहे और संबंधित बैच के संबंध में क्या कार्रवाई की गई।वहीं सीडीएससीओ और राज्य ड्रग विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि बार-बार गुणवत्ता संबंधी सवाल उठने के बावजूद संबंधित इकाई की निगरानी व्यवस्था में क्या बदलाव किया गया और अब तक क्या ठोस कार्रवाई हुई?क्योंकि सवाल सिर्फ ओरिसन फार्मा का नहीं है।
सवाल उस पूरी व्यवस्था का है जो दवा को मरीज तक पहुंचने से पहले सुरक्षित मानती है—और फिर प्रयोगशाला जांच में वही दवा गुणवत्ता के पैमाने पर फेल निकल जाती है।
अब देखना यह है कि ताजा ड्रग अलर्ट के बाद कार्रवाई सिर्फ एक और बैच के रिकॉल और नोटिस तक सीमित रहती है या सीडीएससीओ और राज्य ड्रग विभाग ओरिसन फार्मा के पूरे गुणवत्ता नियंत्रण तंत्र की जवाबदेही भी तय करते हैं।
उधर ऑडिशन फार्मा कंपनी के मालिक राकेश गोयल से उनके मोबाइल नंबर पर फोन भी किया गया और उनका व्हाट्सएप पर मैसेज कर पक्ष भी मांगा गया बावजूद इसके बार-बार पूछे जाने पर उनके द्वारा अपना पक्ष नहीं दिया गया।
उधर राज्य दवा नियंत्रक मनीष कपूर से भी इस बाबत पक्ष लेने के लिए फोन किया गया मगर उनके द्वारा भी फोन नहीं उठाया गया और ना ही इस पर व्हाट्सएप संदेश के अनुरूप जवाब दिया गया।