ग्रामीण रसोई पर 45 दिन का ताला , मोदी सरकार ने चूल्हे बंद कराए, सिस्टम ने गैस पर बिठाया पहरा
Himachalnow / नाहन
ग्रामीण क्षेत्रों में लागू 45 दिन का गैस बुकिंग नियम अब लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन गया है। गैस एजेंसियों में पर्याप्त स्टॉक होने के बावजूद उपभोक्ताओं को समय पर सिलेंडर नहीं मिल पा रहा। इससे पूरी तरह एलपीजी पर निर्भर परिवारों की रसोई व्यवस्था प्रभावित हो रही है। लोग अब इस नियम में राहत देने और जरूरत के अनुसार सप्लाई सुनिश्चित करने की मांग कर रहे हैं।
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जिला सिरमौर के ग्रामीण इलाकों में रसोई गैस की आपूर्ति को लेकर लागू 45 दिन का नियम अब बड़ा जनमुद्दा बनता जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि गैस एजेंसियों में स्टॉक भरपूर है, लेकिन गांवों के उपभोक्ता समय पर सिलेंडर नहीं ले पा रहे। नतीजतन जिन परिवारों की रसोई पूरी तरह एलपीजी पर निर्भर है, वे अब सरकारी नियमों के जंजाल में फंसकर परेशान हैं।सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या गांवों में आज भी लोग जंगलों की लकड़ी, उपलों और चूल्हों पर निर्भर हैं? जबकि हकीकत यह है कि सिरमौर के कई गांव अब गांव कम, कस्बे ज्यादा बन चुके हैं। यहां बड़ी संख्या में नौकरीपेशा लोग, बच्चों वाले परिवार, बुजुर्ग और गैस पर पूरी तरह निर्भर गृहस्थियां रहती हैं। ऐसे में 45 दिन का यह नियम लोगों को सुविधा नहीं, सीधी सजा जैसा लग रहा है।
सरकारी नियम के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में एक बार सिलेंडर डिलीवर होने के बाद अगली बुकिंग 45 दिन से पहले नहीं हो सकती, जबकि शहरी क्षेत्रों में यही अंतर 25 दिन का रखा गया है। कागजों में यह नियम कालाबाजारी और पैनिक बुकिंग रोकने के लिए बनाया गया होगा, लेकिन जमीन पर यही व्यवस्था अब आम उपभोक्ताओं की परेशानी का कारण बन गई है।इस पूरे मामले ने इसलिए भी तूल पकड़ा है क्योंकि जिला सिरमौर में करीब 1.62 लाख घरेलू गैस कनेक्शन हैं और यहां 16 सरकारी व निजी गैस एजेंसियां काम कर रही हैं। इसके बावजूद उपभोक्ता समय पर गैस नहीं ले पा रहे। इससे साफ है कि समस्या गैस की कमी नहीं, बल्कि नीति और धरातल के बीच की खाई है।
नाहन के समीप जमटा इसका बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है। स्थानीय लोगों के अनुसार यहां 10 फरवरी को गैस की सप्लाई हुई थी, लेकिन उसके बाद लंबे समय तक अगली आपूर्ति नहीं पहुंची। इससे परिवारों की रसोई व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई। लोगों का कहना है कि सरकार ने एक समय गांव-गांव जाकर धुएं से मुक्ति, स्वच्छ ईंधन और चूल्हा-मुक्त रसोई का सपना दिखाया, लेकिन अब वही उपभोक्ता बुकिंग नियमों के बोझ तले दब गए हैं।ग्रामीणों का कहना है कि सरकार, प्रशासन और तेल कंपनियों को एक ही पैमाने से सभी गांवों को नहीं देखना चाहिए। जिन गांवों की आबादी और खपत अधिक है, जहां ज्यादातर परिवार पूरी तरह एलपीजी पर निर्भर हैं, वहां 45 दिन के नियम में राहत दी जानी चाहिए। लोगों ने यह भी मांग की है कि यदि हर बार पूरी आपूर्ति संभव नहीं है, तो कम से कम आंशिक या 50 प्रतिशत आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।
इस मुद्दे ने इसलिए भी गंभीर रूप ले लिया है क्योंकि अब खुद विभागीय स्तर पर भी यह साफ दिख रहा है कि ग्रामीण इलाकों की वास्तविक जरूरतें और सरकारी नियम आपस में मेल नहीं खा रहे। शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं और लोगों में असंतोष भी साफ दिखाई दे रहा है।खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग सिरमौर के जिला नियंत्रक शमशेर सिंह ने बताया कि कई गांवों से इस तरह की शिकायतें विभाग को मिल रही हैं। उन्होंने कहा कि जमटा गांव में 45 दिन से पहले गैस आपूर्ति की अनुमति के लिए उच्चाधिकारियों को लिखा गया है। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि रसोई गैस की कोई किल्लत नहीं है और एजेंसियों में भरपूर स्टॉक उपलब्ध है।
यानी तस्वीर साफ है—
गैस है, मांग है, जरूरत है… लेकिन नियमों ने गांव की रसोई रोक रखी है।