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चौधरी सरवन कुमार बोले- चौड़ी पट्टी वाली गेहूं में इस रसायन का ना करें प्रयोग….

Ankita • 16 Dec 2023 • 1 Min Read

मुर्गी पालन और दुधारू भैंसों के लिए दी गई बड़ी जानकारी……

HNN/ कांगड़ा

कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के प्रसार निदेशक चौधरी सरवन कुमार के द्वारा दिसंबर 2023 माह के दूसरे पखवाड़े के लिए किसानों हेतु महत्वपूर्ण जानकारी जारी की गई है। प्रेस बयान जारी करते हुए उन्होंने बताया कि कृषि तथा पशुपालन वैज्ञानिकों के द्वारा किए गए शोध के बाद यह सुनिश्चित किया गया है की चौड़ी पट्टी वाली गेहूं में 2,4-डी रसायन का प्रयोग बिल्कुल ना करें।

उन्होंने बताया कि दलहनी तथा तिलहनी फसलों में अगर खरपतवार ज्यादा हो तो उसमें रसायन के प्रयोग की जगह गुड़ाई कर देनी चाहिए। वहीं उन्होंने सब्ज़ी उत्पादन को लेकर बताया कि प्रदेश की निचले एवं मध्यवर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में प्याज की तैयार पौध की रोपाई 15-20 सेंटीमीटर पंक्तियों में तथा 5-7 सेंटीमीटर पौधे से पौधे की दूरी पर करें।

रोपाई के समय 250 क्विंटल गोबर की खाद के अतिरिक्त 235 किलोग्राम इफको मिश्रित खाद (12ः32ः16), 35 कि.ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश तथा 105 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर खेतों में डालें। रोपाई के उपरान्त खेतों में हल्की सिंचाई करें। मध्यवर्ती क्षेत्रों में आलू की बुआई के लिए सुधरी किस्मों जैसे कुफरी ज्योति, कुफरी गिरिराज, कुफरी चन्द्रमुखी इत्यादि का चयन करें।

बुआई के लिए स्वस्थ, रोग रहित, साबुत या कटे हुए कन्द, वजन लगभग 30 ग्राम, जिनमें कम से कम 2-3 आंखें हों, का प्रयोग करें। बुआई से पहले कन्दों को डाइथेन एम-45 (25 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी) के घोल में 20 मिनट तक उपचारित करें। कंद को छाया में सुखाने के बाद अच्छी तरह से तैयार खेतों में 45-60 सेंटीमीटर पंक्तियों की दूरी एवं 15-20 सेंटीमीटर के अंतर पर बुआई करें। कंद को छाया में पंक्तियों की दूरी पर मेढ़े बनाकर करें।

बीजाई से पहले 10 क्विंटल गोबर की खाद के अतिरिक्त 10 कि.ग्रा. इफको (12ः32ः16) मिश्रण खाद तथा 2.5 किग्रा. यूरिया प्रति कनाल खेतों में डालें। आलू में प्रभावी खरपतवार नियंत्रण के लिए एट्राटाफ 60 ग्राम या एरेलान /ग्रामिलोन 70 ग्राम या गोल 40 मिली लीटर को 30 लीटर पानी में मिलाकर प्रति कनाल में छिड़काव किया जा सकता है। आलू में शिघ्र खरपतवार नियंत्रण के लिए ग्रामेक्साॅन या पैराक्वेट 90 मिली लीटर प्रति 30 लीटर पानी में घोल बनाकर आलू के 5 प्रतिशत अंकुरण तक प्रति कनाल किया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त खेतों में लगी हुई सभी प्रकार की सब्ज़ियों जैसे फूलगोभी, बन्दगोभी, गांठगोभी, ब्राॅकली, चाईनीज बन्दगोभी, पालक, मेथी, मटर व लहसुन इत्यादि में निराई-गुड़ाई करें तथा नत्रजन 40-50 कि.ग्रा. यूरिया प्रति हेक्टेयर खेतों में डालें। वहीं उन्होंने फसल संरक्षण को लेकर बताया कि सरसों वर्गीय तिलहनी फसलों अथवा गोभी वर्गीय सब्ज़ियों में तेले या एफिड के नियंत्रण के लिए मैलाथियान 50 ई. सी. 30 मि.ली./30 लीटर पानी प्रति कनाल का छिड़काव करें।

अधिक प्रकोप न होने पर तेले से ग्रस्त पत्तियाँ अथवा तनों को नष्ट करने से भी तेले पर नियंत्रण किया जा सकता है। प्रदेश के क्षेत्रों में किसान चने की फसल में फली छेदक सुंडी के प्रकोप के प्रति सावधान रहें तथा हरे रंग की सुंडियां फसल पर प्रकट होते ही साइपरमिथरिन 1मि.ली./लीटर पानी का छिड़काव करें तथा चने की सुण्डी के लिए फेरोमोन ट्रैप के 25 ट्रैप /हैक्टयर लगाएं। जिन क्षेत्रों में भूमि में पाये जाने वाले कीटों जैसे दीमक, कटुआ कीट, सफेद सुंडी व लाल चीटियां आदि का प्रकोप हो वहां गोभी की रोपाई से पहले 2 लीटर क्लोरपायरीफास 20 ई. सी. और 25 कि. ग्रा. रेत प्रति हैक्टेयर मिलाकर छिड़काव करें।

गोभी वर्गीय सब्जी फसल में एफिड एवं कैटरपिलर के नियंत्रण के लिए मैलाथियान 50 ई.सी. की 30 मिली लीटर रसायन को 30 लीटर पानी में मिलाकर एक कनाल में छिड़काव करें। पशुधन को लेकर उन्होंने बताया कि दिसम्बर महीने में तापमान में गिरावट होने के कारण पशुओं में कई प्रकार की बीमारियां सामने आती है जिनमे से कुछ अति संक्रामक रोग पशुओं के लिए घातक साबित होते हैं। उन्ही में से कुछ बीमारियां विषाणु के कारण होती है जो की जानवरों की बड़े पैमाने पर मृत्यु का कारण बनती है।

पशुपालक जानवरों में बीमारी के किसी भी लक्षण जैसे भूख न लगना या कम होना, तेज बुखार, चमड़ी पर लाल धबे या फोफोले निकलना तथा आँख-नाक-मुंह से अत्यधिक स्राव की स्थिति में, तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह ले। पशु चिकित्सक की सलाह से पशुओं को पेट व जिगर के कीड़े मारने की दवाई दें। यदि पशुओं को केवल सूखा चारा ही खिला रहे हों तो प्रत्येक पशु को प्रतिदिन 40 ग्राम की दर से खनिज लवण मिश्रण अवश्य खिलाऐं।

पशुओं को दिन में धूप में और रात को अन्दर बाधें और सर्दी से बचाव का हर संभव उपाय करें। दूध निकालने के बाद थनों पर वैसलीन या मक्खन लगा दें। गर्भधारण सुनिश्चित करने के लिए पशुओं का निरीक्षण 2-3 महीने के अन्दर करवा लें। भैसों में गर्माने के लक्षण मंद होते है अतः सुबह शाम भैसों में इनका विशेष ध्यान रखें। नये खरीदे हुए चूज़ों को बड़ी मुर्गियों के आवास से दूर पालें। आवास में रोशनी कम से कम 16 घंटे रहनी चाहिए।

पशु पालकों को कहा गया कि अपने क्षेत्रों की भौगोलिक तथा पर्यावरण परिस्थितियों के अनुसार अधिक एवं अतिविशिष्ठ जानकारी हेतु नजदीक के कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क बनाए रखें। अधिक जानकारी के लिए कृषि तकनीकी सूचना केन्द्र एटिक 01894-230395/1800-180-1551 से भी सम्पर्क कर सकते हैं।