जिला सिरमौर की होली में रसायनों की आहट
शासन और प्रशासन की अनदेखी के चलते सस्ते रंगों पर जंग, खुलेआम लूट
नाहन।
होली के नजदीक आते ही जिला सिरमौर के बाजार रंगों से भर गए हैं, लेकिन इन रंगों की गुणवत्ता और सुरक्षा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। बाजारों में खुलेआम बोरियों में भरकर रंग बेचे जा रहे हैं। कई पैकेट ऐसे हैं जिन पर न तो ब्रांड नाम अंकित है और न ही निर्माण तिथि, बैच नंबर या रासायनिक विवरण दर्ज है।
सवाल यह है कि आखिर ये रंग किस मानक पर तैयार हुए और किस जांच के बाद बाजार तक पहुंचे? उद्योग विभाग पर औद्योगिक उत्पादों की गुणवत्ता जांच का दायित्व है, लेकिन अब तक किसी सघन निरीक्षण या सैंपलिंग की सूचना सामने नहीं आई।
राज्य कर एवं आबकारी विभाग की जिम्मेदारी टैक्स और बिलिंग की निगरानी की है। बाजार में बिक रहे कई रंगों के पैकेट बिना किसी बिल या वैध दस्तावेज के दिखाई दे रहे हैं। यदि रंग बिना जीएसटी भुगतान और उचित बिलिंग के बाजार तक पहुंचे हैं तो यह सीधे-सीधे टैक्स चोरी का मामला बनता है। ऐसे में सरकार को लाखों रुपये के राजस्व का नुकसान होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
खाद्य सुरक्षा विभाग त्योहारों पर मिठाइयों और खाद्य पदार्थों की जांच में सक्रिय रहता है, लेकिन होली जैसे बड़े पर्व पर रंगों की गुणवत्ता को लेकर कोई विशेष अभियान नजर नहीं आया। प्रशासन की यह चुप्पी लोगों के स्वास्थ्य के प्रति गंभीर लापरवाही मानी जा रही है।
बाजार में बिक रहे सस्ते और संदिग्ध रंगों में हानिकारक रसायन होने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। त्वचा, आंखों और श्वसन तंत्र पर इनके दुष्प्रभाव को लेकर विशेषज्ञ समय-समय पर चेतावनी देते रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर निगरानी कमजोर दिखाई दे रही है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. राकेश प्रताप ने बताया कि विभाग द्वारा होली से पहले एडवाइजरी जारी कर लोगों से ऑर्गेनिक रंगों के उपयोग की अपील की जाती है तथा केमिकल युक्त रंगों से बचने की सलाह दी जाती है।
फिलहाल हालात यह संकेत दे रहे हैं कि पवित्र पर्व की आड़ में सस्ते रंगों का खेल जारी है। एक ओर लोगों के स्वास्थ्य पर खतरा मंडरा रहा है, दूसरी ओर राजस्व को नुकसान पहुंचने की आशंका है। अब देखना यह है कि संबंधित विभाग कागजी चेतावनियों से आगे बढ़कर सख्त कार्रवाई करते हैं या नहीं।