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पद्मश्री विद्यानंद सरैक के निर्देशन में ‘राहु रो रीण’ का मंचन

PRIYANKA THAKUR 31 Mar 2026 Edited 31 Mar 1 min read

Himachalnow / सिरमौर

‘राहु रो रीण’ लोकनाट्य के माध्यम से बेठू प्रथा की पीड़ा और सामाजिक चेतना को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। पद्मश्री विद्यानंद सरैक के निर्देशन में तैयार इस प्रस्तुति ने दर्शकों को हिमाचली लोक संस्कृति और परंपराओं से जोड़ा। कार्यक्रम ने लोककलाओं के संरक्षण के साथ समाज में जागरूकता का संदेश भी दिया।

राजगढ़

आसरा संस्था की ओर से हाब्बी मानसिंह कला केंद्र, जालग (पझौता) में संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत तैयार लोकनाट्य ‘राहु रो रीण’ का प्रभावशाली मंचन किया गया। यह प्रस्तुति पद्मश्री विद्यानंद सरैक के कुशल निर्देशन में तैयार की गई।आसरा संस्था के प्रभारी एवं अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लोककलाकार डॉ. जोगेंद्र हाब्बी ने बताया कि पद्मश्री विद्यानंद सरैक द्वारा लिखित ‘राहु रो रीण’ उपन्यास की कथा पर आधारित यह लोकनाट्य करियाला शैली के झूलणे स्वांग की परंपरा में मंचित किया गया। इसमें झूलणा स्वांग और गराल्टू झूरी जैसी सिरमौर की विलुप्तप्राय लोक विधाओं का भी प्रभावी समावेश किया गया, जिससे प्रस्तुति को सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष स्वरूप मिला।

लोकनाट्य में प्राचीन बेठू प्रथा की मार्मिक और सच्चाई से जुड़ी कथा को मंच पर जीवंत किया गया। नाटिका में दिखाया गया कि कैसे शोभू के परदादा द्वारा लिया गया मामूली ऋण पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ता गया और चौथी पीढ़ी तक परिवार को बंधुआ श्रम के अभिशाप में जीना पड़ा। बाद में मिसरू लाला जैसे जागरूक पात्र के माध्यम से सामाजिक चेतना का संदेश उभरता है, जो शोभू को बेठू प्रथा की जंजीरों से मुक्त कर सम्मानजनक जीवन की राह देता है।प्रस्तुति में संदीप, चमन, रामलाल, गोपाल, सरोज, अनु और बिमला ने मुख्य भूमिकाएं निभाईं। वहीं चिरंजी लाल, सुनील, अमीचंद, दिनेश, रवि, मुकेश और मनमोहन सहित अन्य कलाकारों ने भी अपने अभिनय से पात्रों को प्रभावी रूप से मंच पर उतारा।

संगीत पक्ष में संदीप ने ढोलक, रविदत्त ने करनाल, सोहनलाल ने शहनाई, विद्या दत्त ने बांसुरी और ओम प्रकाश ने नगाड़ा वादन से प्रस्तुति को और जीवंत बनाया। इसके अतिरिक्त हेमलता, मंगेश, प्रीति और रेखा सहित अन्य लोक कलाकारों ने भी अपनी सहभागिता निभाई।डॉ. जोगेंद्र हाब्बी ने बताया कि इस प्रकार की लोक प्रस्तुतियां केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को अपनी जड़ों, इतिहास और लोक चेतना से जोड़ने का सशक्त माध्यम हैं।