मिट्टी से हिमाचल की नई पहचान गढ़ रहा प्रियांशु
क्ले आर्ट में नाहन के युवा कलाकार ने दिखाई अलग राह, उंगलियों से मिट्टी को आकार देकर राष्ट्रीय मंच की ओर बढ़ा कदम
हिमाचल नाऊ न्यूज नाहन
हिमाचल की पहचान पहाड़ों, देवभूमि की संस्कृति और प्राकृतिक खूबसूरती से तो होती ही है, लेकिन अब इसी पहचान में कला की एक नई तस्वीर जुड़ने लगी है। नाहन का युवा कलाकार प्रियांशु पुंडीर मिट्टी को अपनी रचनात्मकता का माध्यम बनाकर क्ले आर्ट की ऐसी दुनिया तैयार कर रहा है, जो उसे भीड़ से अलग खड़ा करती है।

जहां आज का युवा डिजिटल स्क्रीन पर अपनी रचनात्मकता तलाश रहा है, वहीं प्रियांशु अपने हाथों में मिट्टी लेकर कल्पनाओं को आकार दे रहा है। उसकी बनाई आकृतियों में सिर्फ कारीगरी नहीं, बल्कि प्रकृति, जीव-जंतुओं और आसपास की दुनिया को अपने नजरिए से देखने की कोशिश दिखाई देती है।
कछुआ हो या पेड़ की शाखा पर बैठा पक्षी, प्रियांशु की उंगलियां मिट्टी को आकार देते हुए उसमें एक कहानी छोड़ जाती हैं। यही उसकी कला की सबसे बड़ी खूबसूरती है।
शौक से पहचान और पहचान से बड़े मंच तक
नाहन के बनोग निवासी प्रियांशु के लिए क्ले मॉडलिंग महज समय बिताने का माध्यम नहीं है। यह उसकी रचनात्मक अभिव्यक्ति बन चुकी है। मिट्टी के साथ प्रयोग करते हुए वह लगातार अपनी कला को निखार रहे हैं और अब यही हुनर उन्हें बड़े मंच तक लेकर जा रहा है।

प्रियांशु वर्तमान में डॉ. यशवंत सिंह परमार स्नातकोत्तर महाविद्यालय नाहन में अंग्रेजी विषय में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रहे हैं। पढ़ाई के साथ कला के लिए समय निकालना और उसमें लगातार कुछ नया करने की कोशिश उनकी मेहनत को दर्शाती है।
डिजिटल दुनिया से लेकर मिट्टी की दुनिया तक
प्रियांशु डिजिटल क्रिएटर भी हैं और रील्स बनाने में उनकी रुचि है। ऐसे में उनकी रचनात्मक यात्रा के दो बिल्कुल अलग माध्यम दिखाई देते हैं। एक तरफ कैमरा और डिजिटल स्क्रीन है, तो दूसरी तरफ मिट्टी, हाथ और कल्पना।
यही मेल उन्हें खास बनाता है। तकनीक के दौर में रहते हुए भी परंपरागत कला को चुनना और उसे अपनी आधुनिक सोच के साथ आगे बढ़ाना प्रियांशु की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आ रहा है।
शिमला के मंच पर नाहन का हुनर
अब प्रियांशु अपने इसी हुनर के साथ शिमला में आयोजित होने वाले यूथ फेस्टिवल में कॉलेज का प्रतिनिधित्व करेंगे। क्ले मॉडलिंग में अपने कौशल का प्रदर्शन करते हुए वह नाहन के साथ-साथ हिमाचल की युवा रचनात्मकता को भी मंच देने की कोशिश करेंगे।
प्रियांशु की यह यात्रा अभी शुरुआत है, लेकिन शुरुआत ऐसी है जिसमें संभावनाएं बड़ी दिखाई देती हैं। अगर मिट्टी में छिपी कल्पना को मंच मिलता रहा तो आने वाले समय में यही युवा कलाकार हिमाचली कला को एक अलग पहचान देने वाले चेहरों में शामिल हो सकता है।
मिट्टी को आकार देने वाले हाथ आज छोटी-छोटी आकृतियां बना रहे हैं, लेकिन इन्हीं हाथों में कल हिमाचल की कला की एक नई पहचान गढ़ने की क्षमता दिखाई देती है।