राज्यपालों की नियुक्ति में हिमाचल की अनदेखी क्यों? शांता कुमार और डॉ. राजीव बिंदल जैसे दिग्गजों पर क्यों नहीं दांव लगा रही भाजपा?
रामलाल और अश्वनी कुमार हिमाचल से निकलकर संभाल चुके हैं दूसरे राज्यों के राजभवन की जिम्मेदारी, अब प्रदेश के वरिष्ठ भाजपा नेताओं को मौका मिलने की चर्चा
हिमाचल नाऊ न्यूज़ | शिमला/नाहन
देश के छह राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति और फेरबदल के बाद हिमाचल प्रदेश की सियासत में भी एक अहम सवाल खड़ा हो गया है। राजनीतिक अनुभव, संगठनात्मक पकड़ और सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने वाले प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं को आखिर कब किसी दूसरे राज्य के राजभवन की जिम्मेदारी मिलेगी? पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल जैसे नाम इस चर्चा के केंद्र में हैं। हालिया नियुक्तियों में हिमाचल के किसी नेता को राज्यपाल नहीं बनाया गया है।
हिमाचल प्रदेश का इतिहास बताता है कि राज्य ने पहले भी ऐसे व्यक्तित्व दिए हैं जिन्होंने दूसरे राज्यों में राज्यपाल के रूप में जिम्मेदारी संभाली। ठाकुर रामलाल हिमाचल के मुख्यमंत्री रहे और 15 अगस्त 1983 को आंध्र प्रदेश के राज्यपाल नियुक्त हुए। दूसरी ओर, नाहन से संबंध रखने वाले अश्वनी कुमार भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे। हिमाचल के पुलिस महानिदेशक और केंद्रीय जांच ब्यूरो के निदेशक का पद संभालने के बाद उन्होंने 2013 में नागालैंड के राज्यपाल की जिम्मेदारी संभाली तथा कुछ समय तक मणिपुर के राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार भी उनके पास रहा। यानी हिमाचल से जुड़े लोगों का राजभवन तक पहुंचने का इतिहास रहा है, लेकिन अब सवाल है कि प्रदेश के मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व में से किसी को यह अवसर कब मिलता है।
शांता कुमार के अनुभव को क्यों माना जा सकता है दावेदारी का आधार?
भाजपा के वरिष्ठ नेता शांता कुमार हिमाचल की राजनीति के उन चेहरों में शामिल हैं जिन्होंने प्रदेश सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं। वह दो बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में केंद्रीय मंत्री के रूप में भी कार्य किया। संसदीय राजनीति, प्रशासनिक अनुभव और संगठन के साथ लंबे जुड़ाव ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
शांता कुमार का राजनीतिक सफर केवल सत्ता के पदों तक सीमित नहीं रहा। वह संगठनात्मक राजनीति और सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय रहे हैं। राज्यपाल का पद किसी दल के नेता को राजनीतिक इनाम देने का पद नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है। फिर भी, लंबे राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव वाले नेताओं के नाम ऐसी नियुक्तियों की चर्चा में आना स्वाभाविक है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भाजपा नेतृत्व भविष्य में शांता कुमार जैसे वरिष्ठ नेता के अनुभव को किसी संवैधानिक जिम्मेदारी में उपयोग करने पर विचार करेगा?
डॉ. राजीव बिंदल: संगठन से सरकार और विधानसभा तक का सफर
डॉ. राजीव बिंदल का राजनीतिक सफर भी उन्हें प्रदेश के प्रमुख नेताओं में शामिल करता है। सोलन नगर परिषद के अध्यक्ष के रूप में राजनीतिक शुरुआत करने के बाद वह सोलन से विधायक चुने गए। इसके बाद नाहन विधानसभा क्षेत्र से भी उन्होंने जीत दर्ज की। वह पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे और जनवरी 2018 में हिमाचल प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष बने। भाजपा संगठन में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है। वर्ष 2025 में वह तीसरी बार हिमाचल प्रदेश भाजपा अध्यक्ष चुने गए।
डॉ. बिंदल के राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण पहलू उनका संगठनात्मक और विधायी अनुभव है। स्वास्थ्य मंत्री के रूप में प्रशासनिक कामकाज, विधानसभा अध्यक्ष के रूप में सदन की कार्यवाही का संचालन और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के रूप में संगठन का नेतृत्व करना उनके सार्वजनिक जीवन के अलग-अलग आयाम हैं। इन अनुभवों के आधार पर उन्हें राज्यपाल पद के संभावित दावेदार के रूप में चर्चा में रखा जा सकता है। हालांकि, इस संबंध में भाजपा नेतृत्व की ओर से कोई आधिकारिक संकेत या नियुक्ति की घोषणा नहीं हुई है।
क्या हिमाचल को राष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रतिनिधित्व की जरूरत है?
राज्यपालों की नियुक्ति में राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं के साथ प्रशासनिक और अन्य क्षेत्रों के अनुभवी व्यक्तियों को भी जिम्मेदारी दी जाती रही है। इसलिए किसी राज्य से नेता का नाम नहीं आना अपने आप में राजनीतिक उपेक्षा का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। फिर भी, हिमाचल जैसे छोटे राज्य में लंबे समय तक संगठन और सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर संवैधानिक जिम्मेदारियां मिलने का मुद्दा राजनीतिक चर्चा का विषय बन सकता है।
भाजपा के पास शांता कुमार जैसे वरिष्ठ नेता का लंबा राजनीतिक अनुभव है, जबकि डॉ. राजीव बिंदल वर्तमान में प्रदेश संगठन का नेतृत्व कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भविष्य में इनमें से किसी नेता को राज्यपाल पद या किसी अन्य राष्ट्रीय जिम्मेदारी के लिए चुना जा सकता है?
फिलहाल, छह राज्यों की हालिया नियुक्तियों में हिमाचल के किसी नेता का नाम शामिल नहीं है। यह कहना कि भाजपा नेतृत्व ने जानबूझकर हिमाचल के नेताओं की पैरवी नहीं की, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर साबित नहीं किया जा सकता। लेकिन राज्यपालों की नियुक्तियों के बाद हिमाचल के वरिष्ठ नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी संवैधानिक जिम्मेदारी मिलने की संभावना पर चर्चा जरूर हो सकती है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि आने वाले समय में केंद्र सरकार और भाजपा नेतृत्व हिमाचल के किसी अनुभवी चेहरे को ऐसी जिम्मेदारी सौंपता है या नहीं।