संघर्ष की मिसाल “क्यारशो देवी”: एक आदर्श बेटी, बहू और मां की सच्ची कहानी
HNN/ नाहन
एक छोटे से गांव में लड़की पैदा हुई, जिसका नाम था क्यारशो देवी। वह न केवल अपने माता-पिता की दुलारी थी, बल्कि उनकी आंखों का तारा भी थी। लेकिन माता-पिता को भी ये मालूम नहीं था कि क्यारशो देवी के छोटे जीवन में कितनी मुसीबतें आएंगी, तब तक वे बेटी के साथ होंगे भी या नहीं। जब क्यारशो महज 10 साल की थी तो उनके बड़े भाई की किसी बीमारी से मृत्यु हो गई।
अब क्यारशो देवी और उनकी बड़ी बहन (मैना देवी) अपने माता-पिता की दो संतानें बची थीं। वक्त बीता तो उनकी बड़ी बहन की शादी हो गई। घर पर अब क्यारशो देवी और उसके माता-पिता ही थे। क्यारशो 18 साल की हुई तो उनकी भी शादी हो गई, जिन्हों पांच बच्चों को जन्म दिया। शादी के बाद उन्हें अपने माता-पिता के अकेले होने का गम बार-बार सताता।
इसलिए, उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर माता-पिता को पालने का निर्णय लिया और अपने बूढ़े मां-बाप के साथ रहना शुरू कर दिया, लेकिन जिंदगी ने क्यारशो देवी को एक के बाद एक चुनौतियां दीं। 1992 में उनके पिता मृत्यु हो गई। 2009 में पति ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया। ऐसी परिस्थितियों में भी क्यारशो ने हार नहीं मानी।
पांच बच्चों के पालन पोषण के साथ साथ अपनी मां और सास-ससुर की जिम्मेदारी भी अब उनपर आ गई। और फिर, क्यारशो देवी की जिंदगी में सबसे बड़ा संघर्ष आया. जनवरी 2015 में अपनी मां को खो दिया। 2016 में ससुर चल बसे तो 2017 में सास ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया। अब क्यारशो देवी बहुत अकेली पड़ गई थी।
अब न तो उनके सिर पर पति का साया था। न सास-ससुर रहे और न ही मां-पिता। इन सब परिस्थितयों में भी क्यारशो देवी ने जीवन के इस संघर्ष का डटकर मुकाबला किया। उन्होंने न केवल अपने बच्चों को शिक्षित बनाया, बल्कि मां के फर्ज के साथ साथ आदर्श बेटी और बहू का भी कर्तव्य निभाया।
जी हां, ये एक सच्ची कहानी है। सिरमौर के अति दुर्गम गांव दियूड़ी खड़ाह पंचायत के स्याड गांव में जन्मीं क्यारशो देवी (1963) की। उन्होंने एक आदर्श बेटी की भूमिका निभाने से लेकर एक बहू और मां की जिम्मेदारी निभाई। क्यारशो देवी ने अपने परिवार के लिए कठोर परिश्रम और साहस का मूल मंत्र अपनाया।
वह खुद अशिक्षित थी, लेकिन ताउम्र एक शिक्षित महिला की तरह जीवन जीया। वे भी अब इस दुनिया में नहीं हैं। इसी साल 16 जुलाई 2024 को शारीरिक अस्वस्थता के चलते उनका 60 साल की उम्र में निधन हो गया। उनका विवाह 1981 में भवाई पंचायत के गांव कुफर के बस्तीराम के साथ हुआ, लेकिन 2009 में वह भी चल बसे। क्यारशो देवी के परिवार के सदस्यों का दुनिया से ऐसे जाना हुआ कि एक के बाद एक उनको अकेला छोड़ गए।
उन्हें जिंदगी में संघर्ष, चुनौतियां और दुखों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। क्यारशो देवी की जिंदगी की ये सच्ची कहानी आपको प्रेरित करेगी। आपको हार नहीं मानने की प्रेरणा देगी और आपको दिखाएगी कि जिंदगी में कठोर परिश्रम और साहस से कुछ भी हासिल किया जा सकता है।
कहते हैं…
” जरूरी नहीं रोशनी चिरागों से ही हो
बेटियां भी घर में उजाला करती हैं। “
आज, क्यारशो देवी की कहानी एक हकीकत है। वह एक आदर्श बेटी, बहू, और मां की भूमिका को दर्शाती हैं, जिसने अपने परिवार के लिए कठोर परिश्रम और साहस का मूल मंत्र अपनाया। उसकी जिंदगी एक संघर्षपूर्ण सफर थी, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी।