सिरमौर भाजपा में 2027 से पहले शतरंज की बिसात, जयराम के दौरे ने बढ़ाई अंदरूनी हलचल
जयराम-बिंदल साथ दिखे, लेकिन दूरी के संकेत भी चर्चा में; शिलाई-पच्छाद में टिकट की खींचतान और नाहन में चौकोणीय मुकाबले की आहट ने बढ़ाई गुटबाजी की चर्चा
हिमाचल नाऊ न्यूज नाहन।
2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के साथ सिरमौर भाजपा में राजनीतिक शतरंज की बिसात तेजी से सजती दिखाई दे रही है। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर के हालिया सिरमौर दौरे ने संगठन को सक्रिय करने के साथ पार्टी के भीतर चल रहे संभावित ध्रुवीकरण को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

दो बिंदल की मौजूदगी के बावजूद अकेले बाइट देते हुए नेता प्रतिपक्ष
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन कार्यक्रम में जयराम ठाकुर और प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल एक साथ नजर आए, लेकिन कुछ अहम मौकों पर दोनों के बीच दिखाई दी दूरी ने राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं को हवा दे दी। तस्वीरें मतभेद का प्रमाण नहीं होतीं, लेकिन राजनीति में ऐसे संकेतों को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जाता।

शिलाई में भाजपा का सबसे बड़ा स्थानीय चेहरा बलदेव तोमर हैं। विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद हाटी समुदाय को जनजातीय दर्जा दिलाने की मुहिम से उनकी लोकप्रियता मजबूत हुई है और जयराम ठाकुर के करीबी माने जाने के कारण 2027 के समीकरणों में उनका महत्व और बढ़ जाता है। दूसरी ओर संगठन में कुलदीप राणा को मिली नई जिम्मेदारी ने स्थानीय स्तर पर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आने वाले चुनाव में जनाधार और संगठनात्मक समीकरणों में किसका पलड़ा भारी रहेगा।
यही वह बिंदु है जहां शिलाई में भाजपा की मजबूती और उसकी अंदरूनी खींचतान एक साथ दिखाई देती है।पच्छाद में भी कहानी कम दिलचस्प नहीं है। मौजूदा विधायक रीना कश्यप के सामने पूर्व विधायक की सक्रियता और संभावित टिकट दावेदारी की चर्चा भाजपा के भीतर नई राजनीतिक रेखाएं खींच रही है।
हालिया दौरे में नेताओं की मौजूदगी और आपसी दूरी ने इस चर्चा को और हवा दी है। यदि पुराने चेहरे दोबारा टिकट की दौड़ में उतरते हैं तो पच्छाद में मुकाबला केवल कांग्रेस से नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर भी राजनीतिक प्रभाव की परीक्षा बन सकता है।सबसे बड़ा राजनीतिक वैक्यूम नाहन में बनता दिखाई दे रहा है।
यदि डॉ. राजीव बिंदल 2027 में फिर चुनाव मैदान में उतरते हैं तो इस बार मुकाबला पारंपरिक भाजपा-कांग्रेस लड़ाई तक सीमित रहने की बजाय चौकोणीय स्वरूप ले सकता है। एक ऐसे वरिष्ठ भाजपा चेहरे की संभावित सक्रियता ने समीकरणों को खासा दिलचस्प बना दिया है, जिसकी भूमिका को 2012 में बिंदल की पहली बड़ी चुनावी जीत के दौर से जोड़कर देखा जाता है।
बाद में दोनों के बीच राजनीतिक मतभेद इतने बढ़े कि रास्ते अलग हो गए। अब यदि यही चेहरा स्वतंत्र रूप से मैदान में उतरता है तो भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध की संभावना को लेकर चर्चाएं तेज होना स्वाभाविक है।
खास बात यह है कि पार्टी से निष्कासन के दौर के बावजूद इस चेहरे के भाजपा से जुड़े रहने और कांग्रेस की ओर से कथित राजनीतिक अवसरों के बावजूद पार्टी न छोड़ने की चर्चा भी स्थानीय राजनीतिक हलकों में होती रही है। ऐसे में उनका मैदान में उतरना नाहन के चुनावी गणित को पूरी तरह बदलने वाला घटनाक्रम हो सकता है।
पांवटा साहिब में विधायक सुखराम चौधरी की राजनीति अपने अलग समीकरण बना रही है। लंबे समय से उनकी राजनीतिक सक्रियता और उत्तराधिकार को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच कई युवा चेहरे अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं।
लेकिन यहां भाजपा की जमीनी पकड़ अभी भी कांग्रेस के मुकाबले मजबूत मानी जाती है।कुल मिलाकर सिरमौर भाजपा के सामने चुनौती चेहरों की कमी नहीं, बल्कि बढ़ते राजनीतिक ध्रुवों को एक दिशा में रखने की है।
नाहन में संभावित चौकोणीय मुकाबला, शिलाई में बलदेव तोमर बनाम संगठन के समीकरण, पच्छाद में टिकट की खींचतान और पांवटा में उत्तराधिकार की चर्चाएं साफ संकेत दे रही हैं कि 2027 का चुनावी घमासान मतदान से काफी पहले शुरू हो चुका है। अब असली परीक्षा भाजपा नेतृत्व की है कि वह इन अलग-अलग ध्रुवों को एक मंच पर साध पाता है या टिकट की बारी आते-आते यही अंदरूनी शतरंज पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है।