68 सीटों का दावा, संगठन की जमीन कितनी? नाहन से लोजपा की सक्रियता ने बढ़ाए 2027 के सवाल
कांग्रेस पर हमला, भाजपा पर खामोशी; क्या लोजपा की सक्रियता के पीछे कोई बड़ा सियासी समीकरण?
हिमाचल नाऊ न्यूज नाहन
विधानसभा चुनाव 2027 से पहले हिमाचल की राजनीति में लंबे अंतराल के बाद लोक जनशक्ति पार्टी की सक्रियता ने नए राजनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं। नाहन में लोजपा के हिमाचल प्रभारी एवं राष्ट्रीय महासचिव वीरेंद्र विदूड़ी ने प्रदेश की सभी 68 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही। प्रेस वार्ता में कांग्रेस सरकार पर निशाना साधा गया, लेकिन भाजपा को लेकर चुनावी रणनीति के स्तर पर कोई सीधा बयान सामने नहीं आया। इसके उलट विदूड़ी ने यह स्पष्ट किया कि केंद्र में भाजपा नेतृत्व और लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान जो निर्णय लेंगे, वह पार्टी को मान्य होगा।
यही बिंदु 2027 के चुनावी समीकरणों को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा में है। हालांकि इसे किसी संभावित गठबंधन की घोषणा मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन लोजपा के रुख ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि पार्टी प्रदेश में स्वतंत्र राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है या उसकी भूमिका आने वाले व्यापक चुनावी समीकरणों से भी जुड़ सकती है।
लोजपा के लिए नाहन इसलिए अहम है क्योंकि पूर्व विधायक स्वर्गीय सदानंद चौहान इसी सीट से पार्टी को विधानसभा तक पहुंचा चुके हैं। उनके निधन के बाद प्रदेश में लोजपा की राजनीतिक गतिविधियां लंबे समय तक लगभग निष्क्रिय रहीं। अब चुनावी वर्ष में पार्टी की दोबारा सक्रियता के बीच सबसे बड़ी चुनौती पुराना राजनीतिक आधार वापस खड़ा करना है।
फिलहाल प्रदेश में लोजपा की संगठनात्मक स्थिति इतनी मजबूत नहीं है कि उसे 68 सीटों पर प्रभावी चुनावी ताकत माना जाए। ऐसे में 68 सीटों पर प्रत्याशी उतारने का दावा बड़ा जरूर है, लेकिन असली परीक्षा संगठन, स्थानीय चेहरों और बूथ स्तर की मौजूदगी की होगी।
नाहन में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल का पुराना राजनीतिक आधार और कांग्रेस के मौजूदा विधायक अजय सोलंकी की मौजूदगी इस सीट को और महत्वपूर्ण बनाती है। ऐसे में लोजपा की सक्रियता यहां केवल चुनाव लड़ने तक सीमित रहती है या राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करती है, यह आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा।
फिलहाल इतना तय है कि लोजपा ने हिमाचल में वापसी का संकेत दे दिया है, लेकिन 68 सीटों की घोषणा को जमीनी ताकत में बदलना ही पार्टी के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती होगी।