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हिमाचल हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद में डीएनए टेस्ट की मांग ठुकराई, बच्चे की गरिमा को दी प्राथमिकता

हिमांचलनाउ डेस्क नाहन2 • 10 Hours Ago • 1 Min Read

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने वैवाहिक और पितृत्व विवाद से जुड़े मामले में डीएनए टेस्ट कराने की मांग को अस्वीकार करते हुए बच्चों की गरिमा और निजता को महत्वपूर्ण माना है। अदालत ने कहा कि केवल आरोपों की पुष्टि के लिए बच्चों को सामाजिक और मानसिक प्रभाव वाली प्रक्रिया से नहीं गुजराया जा सकता तथा वैवाहिक विवादों में अन्य साक्ष्य भी प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

शिमला

हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के आदेश को रखा बरकरार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद और पितृत्व संबंधी मामले में डीएनए टेस्ट कराने की मांग को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति रमेश वर्मा की एकल पीठ ने चंबा परिवार न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें याचिकाकर्ता द्वारा तीन बच्चों का डीएनए टेस्ट कराने की मांग अस्वीकार की गई थी।अदालत ने अपने आदेश में कहा कि वैज्ञानिक जांच को वैवाहिक विवादों में सामान्य प्रक्रिया के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता, विशेष रूप से तब जब इससे बच्चों की सामाजिक पहचान, गरिमा और निजता प्रभावित होने की संभावना हो। कोर्ट ने कहा कि बच्चों को ऐसे विवादों के प्रत्यक्ष प्रभाव से बचाना न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

बेवफाई के आरोप साबित करने के लिए अन्य साक्ष्य संभव

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति अपनी पत्नी के कथित अवैध संबंधों से जुड़े आरोपों को साबित करने के लिए अन्य वैधानिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्य प्रस्तुत कर सकता है। अदालत ने कहा कि केवल आरोपों के आधार पर डीएनए जांच की अनुमति देना उचित नहीं माना जा सकता।कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि किसी व्यक्ति को जबरन डीएनए टेस्ट के लिए बाध्य करना उसकी निजी जिंदगी में हस्तक्षेप माना जाएगा। अदालत ने कहा कि वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे को कानूनन वैध माना जाता है, जब तक इसके विपरीत ठोस और स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध न हों।

अदालत ने बच्चों की निजता और सामाजिक प्रभाव पर जताई चिंता

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि डीएनए टेस्ट को “रोविंग इंक्वायरी” यानी पर्याप्त आधार के बिना व्यापक जांच के रूप में अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत के अनुसार ऐसे मामलों में महिलाओं और बच्चों की सामाजिक प्रतिष्ठा तथा निजता प्रभावित होने की आशंका रहती है।कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवादों की सुनवाई के दौरान न्यायालयों को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि बच्चों के अधिकार और सम्मान सुरक्षित रहें। अदालत ने यह भी माना कि ऐसे परीक्षणों के सामाजिक प्रभाव दीर्घकालिक हो सकते हैं।

भरण-पोषण विवाद से जुड़ी टिप्पणी भी दर्ज

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि रिकॉर्ड से यह प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता ने निचली अदालत द्वारा तय किए गए भरण-पोषण से बचने के उद्देश्य से आवेदन दायर किया हो सकता है। हालांकि अदालत ने मुख्य रूप से मामले को बच्चों की गरिमा और निजता के दृष्टिकोण से देखा।मामले में याचिकाकर्ता ने दीवानी वाद दायर करते हुए दावा किया था कि संबंधित महिला उसकी कानूनी पत्नी नहीं है। उसका कहना था कि महिला पहले से किसी अन्य व्यक्ति से विवाहित थी और इस कारण उससे हुआ विवाह वैध नहीं माना जा सकता। साथ ही उसने तीनों बच्चों के पितृत्व पर भी सवाल उठाए थे।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का संदर्भ देते हुए कहा कि डीएनए परीक्षण केवल विशेष परिस्थितियों में और पर्याप्त आधार होने पर ही स्वीकार किया जा सकता है। अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजता और बच्चों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

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