हाईकोर्ट का कड़ा रुख: लंबित न्यायिक प्रस्तावों पर जवाबदेही तय, अधिकारी को राहत और सरकार पर ₹25 हजार जुर्माना
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अलग-अलग मामलों में राज्य सरकार के कामकाज पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने न्यायिक बुनियादी ढांचे, नई अदालतों और सहायक कर्मचारियों के लंबित प्रस्तावों पर आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया। एक अन्य मामले में प्रथम श्रेणी अधिकारी का तबादला रद्द कर न्यूनतम कार्यकाल की नीति तय करने को कहा गया। पहले से तय कानूनी विषय में अपील दायर करने पर सरकार की अपील 25 हजार रुपये के जुर्माने के साथ खारिज की गई।
शिमला
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने न्यायिक बुनियादी ढांचे, नई अदालतों के गठन और सहायक कर्मचारियों की भर्ती में देरी पर राज्य सरकार को अगले आदेश से पहले आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए। पीठ ने कहा कि वर्षों से लंबित तर्कसंगत जरूरतों पर फैसला नहीं लेना उचित नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वित्तीय तंगी नागरिकों के त्वरित न्याय पाने के मौलिक अधिकार में बाधा डालने का आधार नहीं हो सकती। इस जनहित याचिका की अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी।
अदालत ने न्यायपालिका के लिए बजट आवंटन पर भी चिंता जताई। आदेश के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025-26 में राज्य के कुल बजट का 0.46 प्रतिशत और आगामी वर्ष में 0.53 प्रतिशत न्यायपालिका के लिए आवंटित किया गया है। इसके बावजूद बुनियादी ढांचे से जुड़े प्रस्ताव लंबित हैं। पिछले तीन वर्षों से अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों के तीन पद और सिविल जजों के 34 पद सृजित करने के प्रस्तावों पर निर्णय नहीं हुआ है। हाईकोर्ट की ओर से मांगी गई 34 अदालतों के बजाय कैबिनेट ने हरोली और बडाणा में दो अदालतों को मंजूरी दी थी, जिनकी मांग नहीं की गई थी।
नए स्वीकृत न्यायिक पदों के साथ जजमेंट राइटर अथवा स्टैनोग्राफर ग्रेड-III और रिकॉर्ड कीपर जैसे आवश्यक कर्मचारियों के पद उपलब्ध कराने का विषय भी लंबित बताया गया। हाईकोर्ट और कुल्लू, बिलासपुर, चंबा, ऊना, मंडी, शिमला, लाहौल-स्पीति, सोलन तथा हमीरपुर सहित जिला अदालतों के न्यायाधीशों के लिए स्वीकृत वाहनों की वित्तीय और वितरण प्रक्रिया भी पूरी नहीं हुई है। पीठ ने 10 अगस्त 2026 की उस अधिसूचना में तत्काल सुधार करने को कहा, जिसमें स्थायी लोक अदालतों में सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीशों को अंशकालिक सदस्य अधिसूचित किया गया था।
प्रथम श्रेणी अधिकारियों के लिए न्यूनतम कार्यकाल तय करने के निर्देश
न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की एकल पीठ ने सरकारी अधिकारियों के बार-बार और असमय तबादलों से जुड़े मामले में कहा कि प्रथम श्रेणी अधिकारियों का भी निश्चित और तर्कसंगत कार्यकाल होना चाहिए। अदालत ने याचिकाकर्ता भबनेश चड्डा का 1 जुलाई 2026 का तबादला आदेश रद्द करते हुए राज्य सरकार को प्रथम श्रेणी अधिकारियों के लिए न्यूनतम कार्यकाल की नीति तय करने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा कि केवल प्रथम श्रेणी अधिकारी होने के कारण किसी कर्मचारी का बार-बार तबादला नहीं किया जा सकता और उसे एक स्थान पर उचित कार्यकाल पूरा करने का अवसर मिलना चाहिए।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को वर्तमान स्टेशन बाली चौकी में कम से कम ढाई से तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा करने दिया जाए। इसके बाद प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार आगे का निर्णय लिया जा सकता है। अदालत ने कहा कि न्यूनतम समय-सीमा निर्धारित होने से किसी स्टेशन पर तर्कसंगत कार्यकाल के संबंध में निष्पक्ष दिशा-निर्देश उपलब्ध होंगे। यह आदेश अधिकारियों के बार-बार होने वाले तबादलों के विरुद्ध दायर याचिका पर सुनवाई के बाद पारित किया गया।
सरकार की अपील जुर्माने के साथ खारिज
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी राम गोपाल के पक्ष में फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की अपील 25 हजार रुपये के जुर्माने के साथ खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि कानूनी रूप से पहले तय हो चुके मामलों में अपील दायर करने से न्यायालय का समय बर्बाद होता है और कर्मचारियों को मानसिक तथा वित्तीय परेशानी का सामना करना पड़ता है। पीठ ने राज्य को आदर्श नियोक्ता बताते हुए कहा कि संबंधित विभागों को अपनी जिम्मेदारी का अहसास कराने के लिए जुर्माना लगाना जरूरी हो गया था।
राम गोपाल को वर्ष 1993 में वन विभाग के तहत इंटीग्रेटेड वॉटरशेड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट कांडी में दैनिक वेतनभोगी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नियुक्त किया गया था। एकल पीठ ने 21 नवंबर 2025 को आठ वर्ष की निरंतर सेवा पूरी होने के बाद उन्हें 1 जनवरी 2001 से नियमित करते हुए वर्क-चार्ज स्टेटस का लाभ देने के निर्देश दिए थे। सरकार ने देरी का आधार लेकर इस आदेश को चुनौती दी, लेकिन खंडपीठ ने दलील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि 9 अक्टूबर 2012 की नियमितीकरण नीति का लाभ पात्र कर्मचारियों तक पहुंचाना सरकार की जिम्मेदारी थी।
