नया प्रावधान: 25,000 से कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में भी वार्ड का गठन
हिमाचल प्रदेश के पिछड़े क्षेत्रों में अब 25,000 से कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में भी जिला परिषद वार्ड बनाए जाएंगे। यह बदलाव हिमाचल प्रदेश पंचायती राज संशोधन विधेयक-2024 के तहत किया जा रहा है, जिसे पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने बुधवार को विधानसभा में पेश किया। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने अपने हालिया डोडरा क्वार दौरे के दौरान यह घोषणा की थी कि डोडरा क्वार को अलग से जिला परिषद वार्ड बनाया जाएगा। हालांकि, यहां जनसंख्या की शर्त आड़े आ रही थी, जिसके कारण अब इस शर्त को संशोधित किया जा रहा है।
वर्तमान प्रावधान और नई आवश्यकता
वर्तमान जनसंख्या मानदंड
इस समय हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम की धारा 89(2) के तहत, प्रत्येक जिला परिषद वार्ड के लिए 25,000 लोगों पर एक सदस्य निर्धारित किया जाता है। यह नियम राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में लागू होता है, लेकिन कई पिछड़े और दूरदराज के क्षेत्रों में जनसंख्या की इस शर्त के कारण स्थानीय प्रतिनिधित्व में कमी आ जाती है।
विशिष्ट समस्याओं का समाधान
हालांकि, यह प्रावधान राज्य के विशिष्ट समस्याओं—जैसे कठिन भौगोलिक परिस्थितियां, सीमित परिवहन बुनियादी ढांचा, संचार समस्याएं, और इनसे उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों—को ध्यान में नहीं रखता। इन समस्याओं के कारण इन क्षेत्रों में निर्धारित जनसंख्या मानदंडों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का गठन करना मुश्किल हो जाता है।
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प्रस्तावित संशोधन और उद्देश्य
राज्य सरकार को अधिक अधिकार
इस समस्या का समाधान करने के लिए हिमाचल प्रदेश पंचायती राज संशोधन विधेयक-2024 में संशोधन का प्रस्ताव है, जिसके तहत राज्य सरकार को यह अधिकार दिया जाएगा कि वह 25,000 से कम जनसंख्या वाले पिछड़े ग्राम पंचायतों के लिए क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण कर सकेगी।
स्थानीय शासन में समावेशिता बढ़ाने का लक्ष्य
विधेयक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य के दूरदराज और कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों को जिला परिषद में उचित रूप से प्रतिनिधित्व मिल सके। इस तरह, इन क्षेत्रों का स्थानीय शासन में अधिक समावेश सुनिश्चित होगा, जिससे यह क्षेत्रों के विकास में मदद मिलेगी।
निष्कर्ष
समावेशी विकास की दिशा में कदम
यह संशोधन विधेयक हिमाचल प्रदेश के पिछड़े और कठिन भौगोलिक क्षेत्रों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। यह न केवल स्थानीय शासन को मजबूत करेगा, बल्कि इन क्षेत्रों को अधिक राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिनिधित्व भी प्रदान करेगा, जिससे उनका समग्र विकास संभव हो सकेगा।
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