कुल्लू दशहरा रथ यात्रा और अनूठे लंका दहन के साथ संपन्न, माता सीता संग लौटे भगवान रघुनाथ
सात दिवसीय ऐतिहासिक अंतर्राष्ट्रीय कुल्लू दशहरा मंगलवार को भगवान रघुनाथ की भव्य रथ यात्रा और पारंपरिक लंका दहन की रस्म के साथ संपन्न हो गया। उत्सव के अंतिम दिन हजारों श्रद्धालुओं ने रथ की डोर खींची और उसे स्पर्श किया। लंका दहन के बाद माता सीता की पालकी कैटल ग्राउंड पहुंची, जहां वह भगवान रघुनाथ और लक्ष्मण के साथ रथ में विराजमान हुईं।
कुल्लू
अंतिम दिन रथ यात्रा ढालपुर स्थित भगवान रघुनाथ के अस्थायी शिविर के पास से शुरू हुई। भगवान रघुनाथ और लक्ष्मण रथ में सवार होकर लंका दहन के लिए निकले। श्रद्धालुओं ने जय श्रीराम के उद्घोष के बीच रथ को खींचकर कैटल ग्राउंड तक पहुंचाया। इस देव यात्रा में कई स्थानीय देवी-देवता भी भगवान रघुनाथ के रथ के साथ चले और पूरा ढालपुर मैदान धार्मिक उद्घोषों से गूंजता रहा।
झाड़ियां जलाकर निभाई लंका दहन की परंपरा
कुल्लू दशहरे में लंका दहन की परंपरा देश के अन्य हिस्सों से अलग है। यहां रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाने के बजाय प्रतीकात्मक रूप से झाड़ियों को आग लगाई जाती है। भगवान रघुनाथ के छड़ीबरदार महेश्वर सिंह, कारदार दानवेंद्र सिंह, हितेश्वर सिंह और आदित्य विक्रम सिंह सहित अन्य देवलुओं ने देवी हिडिम्बा के साथ लंकाबेकर जाकर एक बावड़ी के पास झाड़ियां जलाकर यह प्राचीन रस्म पूरी की।
माता सीता के साथ रथ मैदान लौटे भगवान रघुनाथ
लंका दहन की रस्म पूरी होने के बाद राज परिवार के सदस्य और देवलू कैटल ग्राउंड में खड़े भगवान रघुनाथ के रथ के पास लौटे। इसी दौरान अस्थायी शिविर की ओर से माता सीता की पालकी भी वहां पहुंची। माता सीता के भगवान रघुनाथ और लक्ष्मण के साथ रथ में विराजमान होने के बाद श्रद्धालुओं ने रथ को वापस मोड़ा और जयकारों के बीच खींचकर रथ मैदान तक पहुंचाया।
देवी-देवताओं की देवालयों की ओर वापसी शुरू
रथ मैदान पहुंचने के बाद भगवान रघुनाथ, माता सीता और लक्ष्मण ने दशहरा उत्सव में शामिल सभी देवी-देवताओं से विदाई ली। इसके बाद वे पालकी में सवार होकर अपने मूल स्थान रघुनाथपुर के लिए रवाना हो गए। भगवान रघुनाथ से विदा लेने के बाद कई देवी-देवताओं ने मंगलवार को ही अपने देवालयों की ओर प्रस्थान किया, जबकि शेष देवी-देवता बुधवार को ढालपुर मैदान से अपने गंतव्य के लिए रवाना होंगे।