हिमाचल प्रदेश में आउटसोर्स भर्तियों पर लगी रोक का मामला एक बार फिर चर्चा में है। प्रदेश सरकार ने इस रोक को हटाने के लिए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में अर्जी दायर की है। यह मामला राज्य में भर्तियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता और नियमन से जुड़ा हुआ है। आइए, जानते हैं इस पूरे मामले की विस्तृत जानकारी।
अर्जी दाखिल करने का कारण
सरकार ने आउटसोर्स भर्तियों पर लगी रोक हटाने के लिए हाईकोर्ट में अर्जी दायर की है। महाधिवक्ता ने अदालत को जानकारी दी कि सरकार भर्तियों की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए एक कमेटी का गठन करने पर विचार कर रही है। इस कमेटी की देखरेख में भर्तियों का कार्य संपन्न होगा, जिससे प्रक्रिया में कोई अनियमितता न हो।
सुनवाई की तारीख और खंडपीठ की भूमिका
सरकार की ओर से दायर इस अर्जी पर अब 31 दिसंबर को सुनवाई होगी। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति सत्येन वैद्य की खंडपीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है।
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पृष्ठभूमि: भर्तियों पर क्यों लगी रोक?
हाईकोर्ट ने 7 नवंबर को इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन की ओर से विभागों में की जा रही सभी भर्तियों पर रोक लगा दी थी। अदालत ने कंपनियों और उम्मीदवारों का पूरा डाटा वेबसाइट पर अपलोड करने के निर्देश दिए थे।
याचिकाकर्ता के आरोप
याचिका में आरोप लगाए गए हैं कि:
- फर्जी कंपनियां: प्रदेश में लगभग 110 कंपनियां फर्जी पाई गई हैं।
- नियमों की कमी: भर्तियों की प्रक्रिया के लिए कोई स्पष्ट नियम नहीं बनाए गए हैं।
- पदों का गलत वर्गीकरण: केंद्र की नीति के तहत केवल चतुर्थ श्रेणी के पदों को आउटसोर्स किया जाना चाहिए, जबकि हिमाचल प्रदेश में तृतीय श्रेणी के पदों को भी आउटसोर्स पर रखा जा रहा है।
सरकार का प्रस्ताव: प्रक्रिया में पारदर्शिता
सरकार का कहना है कि नई कमेटी के गठन के बाद, भर्तियों में पारदर्शिता सुनिश्चित होगी। यह कमेटी यह सुनिश्चित करेगी कि कंपनियां और उम्मीदवार सभी आवश्यक मानकों पर खरे उतरें।
आगे की राह
अदालत अब 31 दिसंबर को इस मामले पर सुनवाई करेगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत सरकार की अर्जी को किस नजरिए से देखती है और इस पर क्या निर्णय देती है।
निष्कर्ष
यह मामला हिमाचल प्रदेश में रोजगार और पारदर्शिता से जुड़ा हुआ है। सरकार और अदालत का फैसला न केवल भर्ती प्रक्रिया में सुधार लाने का अवसर प्रदान करेगा, बल्कि फर्जी कंपनियों और अनियमितताओं पर भी लगाम लगाएगा।
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