प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज देश की जनता से ‘मन की बात’ की। यह इस कार्यक्रम का 92वां एपिसोड है। पीएम मोदी ने इस दौरान कहा कि अभी कुछ दिन पहले ही उन्हें सूचना प्रसारण मंत्रालय के कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला। वहां उन्होंने ‘स्वराज दूरदर्शन’ के सीरियल की स्क्रीनिंग रखी थी। यह आजादी के आंदोलन में हिस्सा लेने वाले अनसुने नायक-नायिकाओं के प्रयासों से देश की युवा पीढ़ी को परिचित करने की बेहतरीन पहल है। पीएम मोदी ने कहा कि दूरदर्शन पर हर रविवार रात 9 बजे, इसका प्रसारण होता है, जोकि 75 सप्ताह तक चलने वाला है। समय निकालकर इसे खुद भी देखें और अपने घर के बच्चों को भी दिखाएं, जिससे आजादी के जन्म के इन महानायकों के प्रति हमारे देश में एक नई जागरूकता पैदा होगी।
अमृत महोत्सव के रंग में रंगा हर कोई
पीएम मोदी ने कहा कि अमृत महोत्सव के रंग भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के दूसरे देशों में भी दिखाई दिए। बोत्स्वाना में रहने वाले एक स्थानीय गीतकार ने भी भारत की आजादी के 75 साल मनाने के लिए देशभक्ति के 75 गीत गाए। खास बात यह है कि यह गीत हिंदी, पंजाबी, गुजराती, बांग्ला, तमिल और कई अन्य भाषाओं में गाए गए। वहीं, उन्होंने कहा कि ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ 2023 तक चलेगा।
मोटे अनाज के प्रति बढ़ाएं जागरुकता
मोदी ने कहा कि देश में आज बाजरा यानी मोटे अनाज को बढ़ावा देने के लिए काफी कुछ किया जा रहा है। इससे जुड़ी रिसर्च और इनोवेशन पर फोकस करने के साथ ही FPOs को प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि, उत्पादन बढ़ाया जा सके। उन्होंने किसानों से आग्रह करते हुए कहा कि मोटे अनाज को ज्यादा से ज्यादा अपनाएं और इसका फायदा उठाएं।
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कुपोषण दूर करने में गीत-संगीत और भजन का भी हो सकता है इस्तेमाल
पीएम मोदी ने कहा कि आप कल्पना कर सकते हैं, क्या कुपोषण दूर करने में गीत-संगीत और भजन का भी इस्तेमाल हो सकता है? मध्य प्रदेश के दतिया जिले में “मेरा बच्चा अभियान” ने इसका सफलतापूर्वक प्रयोग किया गया। इसके तहत, जिले में भजन-कीर्तन आयोजित हुए, जिसमें पोषण गुरु कहलाने वाले शिक्षकों को बुलाया गया। एक मटका कार्यक्रम भी हुआ, इसमें महिलाएं, आंगनबाड़ी केंद्र के लिए मुट्ठी भर अनाज लेकर आती हैं और इसी अनाज से शनिवार को ‘बालभोज’ का आयोजन होता है। इससे आंगनबाड़ी केन्द्रों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ने के साथ ही कुपोषण भी कम हुआ है।
अमृत सरोवर का निर्माण एक जन आंदोलन बन गया: पीएम मोदी
‘मन की बात’ में ही चार महीने पहले मैंने अमृत सरोवर की बात की थी। उसके बाद अलग-अलग जिलों में स्थानीय प्रशासन जुटा, स्वयं सेवी संस्थाएं और स्थानीय लोग जुटे, देखते ही देखते अमृत सरोवर का निर्माण एक जन आंदोलन बन गया है।
पहाड़ों पर रहने वाले लोगों के जीवन से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं
पहाड़ों की जीवनशैली और संस्कृति से हमें पहला पाठ तो यही मिलता है कि हम परिस्थितियों के दबाव में ना आएं तो आसानी से उन पर विजय भी प्राप्त कर सकते हैं, और दूसरा, हम कैसे स्थानीय संसाधनों से आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
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