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विभाजन के बाद भारत आने वाले शरणार्थी नहीं, संघर्ष के योद्धा थे: मोहन भागवत

हिमांचलनाउ डेस्क नाहन II • 1 Hour Ago • 1 Min Read

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि विभाजन के बाद भारत आने वाले लोगों को शरणार्थी कहना उचित नहीं है। उन्होंने उन्हें संघर्ष के योद्धा बताते हुए उनके त्याग, विश्वास और संस्कृति के प्रति समर्पण की सराहना की। कार्यक्रम में उन्होंने शिक्षा और संस्कारों के महत्व पर भी अपने विचार रखे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि वर्ष 1947 के देश विभाजन के बाद पाकिस्तान से भारत आने वाले लोगों को शरणार्थी कहना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि वे संघर्ष के योद्धा थे, जिन्होंने अपनी जमीन, कारोबार और संपत्ति छोड़कर भारत को चुना, लेकिन अपने विश्वास और संस्कृति से कभी समझौता नहीं किया।नागपुर में सिंधु एजुकेशन सोसाइटी के 75वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि विभाजन के समय भारत आने वाले लोग इसलिए यहां आए क्योंकि वे अपने धर्म और परंपराओं के अनुसार बिना भय के जीवन जीना चाहते थे। उन्होंने कहा कि ये लोग सब कुछ पीछे छोड़कर आए, लेकिन उनका आत्मविश्वास कभी नहीं टूटा।

भागवत ने कहा कि इन लोगों ने केवल अपनी संपत्ति नहीं छोड़ी, बल्कि भारत को चुना। इसलिए उन्हें शरणार्थी कहना उनके संघर्ष और त्याग का सही सम्मान नहीं होगा।कार्यक्रम के दौरान उन्होंने शिक्षा के उद्देश्य पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि शिक्षा का लक्ष्य केवल रोजगार दिलाना नहीं, बल्कि अच्छे और संस्कारित नागरिक तैयार करना होना चाहिए। सही और गलत की पहचान केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि शिक्षकों के आचरण और संस्कारों से भी होती है।

उन्होंने कहा कि परिस्थितियों और किस्मत के सामने हार नहीं माननी चाहिए। जो व्यक्ति चुनौतियों का सामना करता है, वही आगे बढ़ता है, जबकि मुश्किलों से भागने वाला पहले ही हार मान लेता है।इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 10 से 12 जुलाई तक कर्नाटक के बेलगावी में आयोजित होने वाली अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक की भी घोषणा की।