शिरगुल महाराज की धरती को बड़ा सम्मान, राजगढ़ का बैसाखी मेला बना राज्य स्तरीय
राजगढ़ के ऐतिहासिक शिरगुल देवता बैसाखी मेले को हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य स्तरीय मेले का दर्जा प्रदान किया है। करीब 75 वर्ष पुरानी इस परंपरा को मिली मान्यता से क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक विरासत को नई पहचान मिलेगी। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस निर्णय से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और मेले का विस्तार प्रदेश स्तर पर और अधिक होगा।
राजगढ़
सिरमौर के राजगढ़ क्षेत्र के लिए गर्व और खुशी की खबर है। क्षेत्र की आस्था, संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक माने जाने वाले शिरगुल देवता बैसाखी मेले को हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य स्तरीय मेले का दर्जा प्रदान कर दिया है। प्रदेश मंत्रिमंडल की हालिया बैठक में लिए गए इस फैसले के बाद पूरे क्षेत्र में उत्साह का माहौल है और लोग इसे राजगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को मिली बड़ी मान्यता के रूप में देख रहे हैं।राजगढ़ का बैसाखी मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सिरमौर, शिमला और सोलन जिलों के बिशू मेलों की परंपरा का पहला और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। आराध्य देव शिरगुल महाराज से जुड़ा यह मेला दशकों से लोक आस्था, भाईचारे और सांस्कृतिक एकता का केंद्र रहा है। हर वर्ष हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचकर न केवल धार्मिक परंपराओं का निर्वहन करते हैं, बल्कि क्षेत्र की समृद्ध लोक संस्कृति का भी साक्षी बनते हैं।
मेले का इतिहास भी बेहद रोचक और गौरवशाली रहा है। स्थानीय इतिहास के अनुसार करीब 75 वर्ष पूर्व यह मेला वर्तमान ग्राम पंचायत बोहल-टालिया के अंतर्गत कुफरधार में आयोजित किया जाता था। उस समय चीड़ के घने जंगलों और प्राकृतिक जल स्रोत के समीप लगने वाला यह मेला क्षेत्र की सबसे बड़ी सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल था। बाद में बढ़ती भागीदारी और क्षेत्रीय जरूरतों को देखते हुए इसे राजगढ़ की सरोट पहाड़ी में स्थानांतरित किया गया।सरोट पहाड़ी में वर्षों तक मेले का आयोजन होता रहा और इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई। बताया जाता है कि उस दौर में प्रदेश के तत्कालीन उप-राज्यपाल भी मेले में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे। बाद में पानी की समस्या के चलते आयोजन में कठिनाइयां आने लगीं, जिसके बाद सरोट गांव के जमींदार स्वर्गीय जालम सिंह भंडारी ने अपनी भूमि मेले के लिए उपलब्ध करवाई। यही मैदान आगे चलकर नेहरू मैदान के नाम से प्रसिद्ध हुआ और तब से आज तक मेले का आयोजन यहीं होता आ रहा है।
वर्तमान में बैसाखी मेले का स्वरूप काफी विस्तृत हो चुका है। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ लोकनृत्य, लोकगायन, सांस्कृतिक कार्यक्रम, पारंपरिक खेल और व्यापारिक गतिविधियां इसे प्रदेश के प्रमुख आयोजनों में शामिल करती हैं। यही वजह है कि लंबे समय से इस मेले को राज्य स्तरीय दर्जा देने की मांग उठती रही और अब सरकार के निर्णय ने उस मांग को पूरा कर दिया है।क्षेत्रवासियों का मानना है कि राज्य स्तरीय दर्जा मिलने से मेले को और अधिक संसाधन उपलब्ध होंगे, पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा तथा राजगढ़ की सांस्कृतिक पहचान प्रदेश और देश के व्यापक फलक पर स्थापित होगी। स्थानीय लोगों ने सरकार के इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है।