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तबादले के खिलाफ याचिका दायर करने से रोकना न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप के समान : हाईकोर्ट

हिमांचलनाउ डेस्क नाहन2 • 1 Hour Ago • 1 Min Read

प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी कर्मचारी को तबादले के खिलाफ अदालत जाने से रोकना न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप माना जा सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायालय में याचिका दायर करना संविधान के तहत प्राप्त अधिकारों का हिस्सा है।

शिमला

हाईकोर्ट ने याचिका दायर करने के अधिकार पर दी स्पष्टता

प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा है कि तबादले के खिलाफ अदालत में याचिका दायर करने से रोकना न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप अथवा बाधा उत्पन्न करने के समान माना जा सकता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा कृत्य आपराधिक अवमानना की परिभाषा के अंतर्गत आ सकता है। अदालत ने कहा कि न्यायालय का दरवाजा खटखटाना भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत नागरिकों और अन्य व्यक्तियों को प्राप्त संवैधानिक अधिकार है।

सरकार के नए प्रावधान के बाद बढ़ी चर्चा

हाल ही में प्रदेश सरकार द्वारा लाए गए एक नए प्रावधान में कहा गया है कि यदि कोई कर्मचारी तबादले के खिलाफ सीधे हाईकोर्ट का रुख करता है तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकती है। इस संबंध में केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1965 तथा अन्य लागू नियमों के तहत कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। कार्मिक विभाग ने व्यापक मार्गदर्शक सिद्धांत-2013 में संशोधन करते हुए फरवरी 2025 में पैरा 22-अ जोड़ा है, जिसमें तबादलों से संबंधित शिकायतों के निवारण की प्रक्रिया निर्धारित की गई है।

पहले सक्षम प्राधिकारी के समक्ष शिकायत रखने के निर्देश

संशोधित प्रावधानों के अनुसार कर्मचारियों को पहले अपनी शिकायत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके बाद भी यदि समाधान नहीं होता है तो अन्य कानूनी विकल्पों का उपयोग किया जा सकता है। हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद अब अनुशासनात्मक कार्रवाई से जुड़े प्रावधानों और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर चर्चा तेज हुई है।

ग्रामीण बैंक मामले का भी किया गया उल्लेख

अदालत में ऐसे ही एक मामले का उल्लेख किया गया, जो हिमाचल प्रदेश ग्रामीण बैंक से संबंधित है। मामले में बैंक के एक कर्मचारी ने अपने तबादले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसके बाद क्षेत्रीय प्रबंधक द्वारा कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। नोटिस में पूछा गया था कि बैंक नीति को दरकिनार कर सीधे हाईकोर्ट में याचिका दायर करने पर उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए।

कोर्ट ने नोटिस पर जताई आपत्ति

हाईकोर्ट ने नोटिस का अवलोकन करने के बाद कहा था कि प्रथम दृष्टया ऐसा कदम अदालत की अवमानना के दायरे में आ सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि क्षेत्रीय प्रबंधक को इस प्रकार का नोटिस जारी करने का अधिकार नहीं था। बाद में संबंधित अधिकारियों ने अदालत से माफी मांगी। यह मामला अभी अंतिम निर्णय के लिए न्यायालय में लंबित है।

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