उत्तरायण काल का आरंभ मकर संक्रांति से होता है, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। यह समय आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को उनकी रात्रि कहा गया है।
उत्तरायण काल को शास्त्रकारों ने साधनाओं एवं परा-अपरा विद्याओं की प्राप्ति के लिए सिद्धिदायक काल माना है। यह समय जीवन में शांति बढ़ाने वाला होता है और सकारात्मकता का प्रतीक है।
उत्तरायण का अर्थ है उत्तर में गमन और सूर्य का उत्तरायण का अर्थ हुआ सूर्य का उत्तर में गमन। यह सूर्य की एक दशा है। उत्तरायण का प्रारंभ मकर संक्रांति से होता है, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है।
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उत्तरायण को दक्षिणायन से श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि यह समय सकारात्मक ऊर्जा, समृद्धि और स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश के साथ ही प्राणहारी ठंड का अंत और वसंत ऋतु के आगमन का शुभ संकेत मिलता है।
उत्तरायण काल न केवल प्रकृति में बदलाव लाता है, बल्कि इसका मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। तेजोमय सूर्य किरणें शरीर को स्वस्थ बनाती हैं। सूर्य के इस परिवर्तन को जीवन में नवचेतना और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
सनातन धर्म में सूर्य के उत्तरायण होने का विशेष आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व है। यह काल शुभ और फलदायी माना गया है, क्योंकि इस समय को देवताओं का ब्रह्म मुहूर्त कहा गया है। मकर संक्रांति से प्रारंभ होने वाला यह समय यज्ञ, व्रत, अनुष्ठान, विवाह और मुंडन जैसे शुभ कार्यों के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।
उत्तरायण काल में किए गए धार्मिक और आध्यात्मिक कार्य शीघ्र फलदायी होते हैं। इस अवधि में सूर्य की उत्तर दिशा में गति के साथ सकारात्मक ऊर्जा और प्रकृति का संतुलन जीवन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है। भारतीय संस्कृति में इस काल को नई शुरुआत का प्रतीक माना गया है, जो मानव जीवन में प्रगति और कल्याण लाने में सहायक है।
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