गिरफ्तारी की वजह लिखित में बताना जरूरी, नहीं तो गिरफ्तारी गैरकानूनी : सुप्रीम कोर्ट
दोबारा गिरफ्तारी से पहले मजिस्ट्रेट की मंजूरी जरूरी, नियम तोड़ने वाले पुलिस अधिकारी पर होगी विभागीय जांच
हिमाचल नाऊ न्यूज दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय पुलिस को गिरफ्तारी का कारण लिखित रूप में बताना जरूरी है। यदि गिरफ्तारी की वजह नहीं बताई जाती है तो ऐसी गिरफ्तारी को गैरकानूनी माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी के समय व्यक्ति को उसकी स्वतंत्रता से वंचित किए जाने का कारण समझ में आने वाली भाषा में उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी व्यक्ति को ऐसी गिरफ्तारी के बाद रिहा कर दिया जाता है और जांच एजेंसी उसे दोबारा गिरफ्तार करना चाहती है, तो पुलिस सीधे उसे गिरफ्तार नहीं कर सकती। ऐसी स्थिति में पहले संबंधित मजिस्ट्रेट से अनुमति लेना जरूरी होगा।
अदालत ने कहा कि पहली गिरफ्तारी के दौरान निर्धारित नियमों का उल्लंघन करने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच की जानी चाहिए। वहीं, दोबारा गिरफ्तारी की स्थिति में मामले की आगे की जांच किसी दूसरे अधिकारी को सौंपने पर भी विचार किया जा सकता है।
यह टिप्पणी शिरोमणि अकाली दल से जुड़े मुल्लांपुर दाखा विधानसभा क्षेत्र के प्रभारी जसकरनजीत सिंह की अपील पर सुनवाई के दौरान सामने आई। मामला नाबालिग से जुड़े यौन अपराध के आरोपों से संबंधित था। रिपोर्ट के अनुसार, उनकी गिरफ्तारी की वजह लिखित में नहीं बताई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर गिरफ्तारी को गैरकानूनी माना।
मामले में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश के बाद सुप्रीम कोर्ट का रुख किया गया था। हाईकोर्ट ने स्थानीय अदालत द्वारा गिरफ्तारी को गैरकानूनी बताने और तत्काल रिहाई के आदेश पर रोक लगा दी थी।
लिखित कारण देना आरोपी का मौलिक अधिकार
जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल चतुर्वेदी की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत आरोपी को गिरफ्तारी की वजह लिखित में और ऐसी भाषा में बतानी होगी, जिसे वह समझ सके। इसकी प्रति भी उसे जल्द से जल्द उपलब्ध करानी होगी। अदालत ने कहा कि यह केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि व्यक्ति का मौलिक और संवैधानिक अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस अधिकार का उल्लंघन होने पर गिरफ्तारी असंवैधानिक हो जाएगी और आरोपी को तत्काल रिहाई का अधिकार होगा। कोर्ट की इस टिप्पणी से गिरफ्तारी की प्रक्रिया में पुलिस और जांच एजेंसियों की जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश सामने आए हैं।