छह दशक का इंतजार खत्म होने की कगार पर, आज किशाऊ पर बड़ा फैसला; उत्तर भारत के लिए ऐतिहासिक दिन..
अमित शाह और सी.आर. पाटिल की मौजूदगी में छह राज्यों के बीच अहम समझौता, हिमाचल के पानी से दिल्ली-राजस्थान की प्यास बुझेगी तो बिजली परियोजना की लागत में राज्यों की होगी भागीदारी
हिमाचल नाऊ न्यूज नाहन/ नई दिल्ली
करीब छह दशक से फाइलों, बैठकों और राज्यों के बीच सहमति के इंतजार में अटकी किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना के लिए आज का दिन निर्णायक साबित हो सकता है। टोंस नदी पर प्रस्तावित इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर नई दिल्ली में छह राज्यों के बीच समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल की मौजूदगी में होने वाली इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया में हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू समेत संबंधित राज्यों के प्रतिनिधि शामिल हैं।
करीब 15 हजार करोड़ रुपये की परियोजना को लेकर सबसे बड़ा पेच वर्षों से पानी के बंटवारे और लागत में राज्यों की हिस्सेदारी को लेकर था। अब केंद्र की पहल के बाद हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के बीच सहमति बनने से परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता खुला है।
422 मेगावाट बिजली, हजारों हेक्टेयर जमीन को सिंचाई का फायदा
किशाऊ परियोजना की मौजूदा सहमति के तहत 422 मेगावाट बिजली उत्पादन प्रस्तावित है। परियोजना सिर्फ बिजली बनाने तक सीमित नहीं है। इसका बड़ा उद्देश्य यमुना बेसिन में पानी का भंडारण कर उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों की पेयजल और सिंचाई जरूरतों को पूरा करना भी है।
परियोजना के वित्तीय ढांचे में जल घटक की लागत का 90 प्रतिशत केंद्र सरकार द्वारा सहायता के रूप में दिया जाना प्रस्तावित है। यही व्यवस्था राज्यों के लिए लंबे समय से चले आ रहे वित्तीय मतभेद को दूर करने में महत्वपूर्ण साबित हुई है।
हिमाचल के लिए समझौता क्यों बेहद अहम?
किशाऊ परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू हिमाचल प्रदेश के पानी और बिजली से जुड़ा है। समझौते के तहत हिमाचल के हिस्से के पानी का उपयोग दिल्ली और राजस्थान सहित मैदानी राज्यों की जरूरतों के लिए किया जाएगा। इसके बदले संबंधित राज्यों की ओर से बिजली परियोजना की लागत में हिस्सेदारी की व्यवस्था की जा रही है।
यानी पहली नजर में यह सिर्फ बांध बनाने का समझौता दिखाई देता है, लेकिन इसके पीछे पानी और बिजली की हिस्सेदारी का पूरा आर्थिक समीकरण जुड़ा हुआ है।
हरियाणा को मिलेगा 836.39 क्यूसेक पानी
परियोजना से हरियाणा को करीब 836.39 क्यूसेक पानी मिलने की बात सामने आई है। इसके लिए हरियाणा की हिस्सेदारी करीब 579 करोड़ रुपये बताई गई है। दिल्ली और उत्तर प्रदेश को भी परियोजना से जल आपूर्ति में महत्वपूर्ण लाभ मिलेगा।
क्यों लगा 60 सालों का वक्त
किशाऊ परियोजना का विचार नया नहीं है। दशकों से यह परियोजना उत्तर भारत की जल और ऊर्जा जरूरतों के समाधान के रूप में सामने आती रही, लेकिन अलग-अलग राज्यों के बीच पानी के उपयोग, हिस्सेदारी और परियोजना लागत को लेकर सहमति नहीं बन पाई।
जून 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक के बाद राज्यों के बीच सहमति का रास्ता खुला था। अब सितंबर में होने वाली समझौता प्रक्रिया को उसी दिशा में निर्णायक कदम माना जा रहा है।
आज फैसला सिर्फ बांध का नहीं है बल्कि
किशाऊ परियोजना पूरी होने पर इसका असर हिमाचल और उत्तराखंड की पहाड़ियों से लेकर दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान तक दिखाई देगा। एक तरफ जल भंडारण और पेयजल की जरूरतें पूरी होंगी, दूसरी तरफ बिजली उत्पादन से ऊर्जा क्षेत्र को फायदा मिलेगा।
इसीलिए किशाऊ को केवल एक जलविद्युत परियोजना के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि उत्तर भारत के पानी और ऊर्जा के भविष्य को प्रभावित करने वाली अंतरराज्यीय परियोजना के रूप में देखा जा रहा है।
करीब छह दशक से जिस परियोजना का इंतजार किया जा रहा था, आज छह राज्यों की सहमति और केंद्र की पहल के बाद उसके धरातल पर उतरने की उम्मीद मजबूत हुई है। अब असली नजर समझौते के बाद की प्रक्रिया पर होगी—क्योंकि आज अगर सहमति कागज पर पक्की होती है, तो अगली चुनौती किशाऊ को कागज से निकालकर जमीन पर उतारने की होगी।