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दिल्ली गेट का जख्मी लिटन मेमोरियल: कभी दूसरों को समय बताता था, आज खुद अपनी बदहाली का समय गिन रहा

Shailesh Saini • 57 Mins Ago • 1 Min Read

नाहन की ऐतिहासिक पहचान पर अनदेखी की मार, उखड़ रहा प्लास्टर, उग आई घास-फूस और दशकों से खामोश हैं घंटियां

हिमाचल नाऊ न्यूज नाहन

जिस ऐतिहासिक लिटन मेमोरियल की घड़ी और घंटियों की आवाज कभी पूरे नाहन शहर को समय का अहसास करवाती थी, आज वही ऐतिहासिक धरोहर अपनी बदहाली का समय गिन रही है। दिल्ली गेट के नाम से प्रसिद्ध यह स्मारक अब संरक्षण के अभाव में धीरे-धीरे जर्जर होता दिखाई दे रहा है। इसकी दीवारों से जगह-जगह प्लास्टर उखड़ चुका है, मेहराबों पर जर्जरता के निशान साफ दिखाई दे रहे हैं और कई हिस्सों में घास-फूस तक उग आई है।

राजा शमशेर प्रकाश के शासनकाल में लॉर्ड लिटन के स्वागत की स्मृति में निर्मित यह स्मारक नाहन के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बाद में यहां स्थापित क्लॉक टावर ने इसे शहर की विशिष्ट पहचान बना दिया। एक दौर में इसकी घंटियों की मधुर आवाज नाहन के एक छोर से दूसरे छोर तक सुनाई देती थी। लोग घंटी की आवाज से समय का अंदाजा लगाते और अपनी दिनचर्या आगे बढ़ाते थे। लेकिन अब यही घंटियां वर्षों से खामोश हैं।

विडंबना यह है कि जिस स्मारक ने कभी पूरे शहर को समय बताया, आज उसकी अपनी घड़ी ही जैसे ठहर गई है। घंटियों को दोबारा शुरू करने की चर्चाएं और प्रयास समय-समय पर सामने आते रहे, लेकिन यह ऐतिहासिक आवाज आज भी नाहन की फिजाओं में सुनाई नहीं देती।

मौजूदा तस्वीर लिटन मेमोरियल की स्थिति पर कई सवाल खड़े करती है। दीवारों पर जगह-जगह से पेंट और प्लास्टर उतर चुका है। स्मारक के आसपास अव्यवस्था और गंदगी दिखाई देती है। दीवारों पर चिपके पोस्टर और विज्ञापन इसकी ऐतिहासिक खूबसूरती को प्रभावित कर रहे हैं। इसके आसपास बेतरतीब खड़े दोपहिया वाहन भी स्मारक की भव्यता को ढक रहे हैं।

सिर्फ इमारत नहीं, नाहन की ऐतिहासिक पहचान है लिटन मेमोरियल

लिटन मेमोरियल नाहन के उन चुनिंदा ऐतिहासिक स्थलों में शामिल है, जिनसे शहर की पहचान और अतीत जुड़ा हुआ है। देश-प्रदेश से नाहन पहुंचने वाले लोगों के लिए दिल्ली गेट शहर की ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में इसके संरक्षण की जिम्मेदारी केवल नगर परिषद तक सीमित नहीं मानी जा सकती, बल्कि यह पूरे शहर की साझा विरासत है।

आज जरूरत इस बात की है कि स्मारक की जर्जर दीवारों और मेहराबों की वैज्ञानिक तरीके से मरम्मत हो, प्लास्टर और रंग-रोगन के साथ इसकी मूल ऐतिहासिक संरचना को सुरक्षित रखा जाए, आसपास की गंदगी और अव्यवस्था हटाई जाए तथा घंटियों और क्लॉक टावर को फिर से चालू करने के लिए विशेषज्ञों की मदद ली जाए।

बहरहाल कभी जिसकी घंटी नाहन को जगाती थी, आज उसी लिटन मेमोरियल की खामोशी प्रशासन से सवाल पूछ रही है—क्या इस ऐतिहासिक धरोहर को उसके हाल पर छोड़ दिया जाएगा या फिर इसकी खोई हुई आवाज और पुरानी पहचान लौटाने के लिए कोई ठोस पहल होगी?