हिमाचल प्रदेश में बच्चों में टाइप-1 डायबिटीज के मामलों में बढ़ोतरी के बीच आरपीजीएमसी टांडा ने एक बड़ी चिकित्सा पहल की है। बाल रोग विभाग ने आठ बच्चों को तीन लाख रुपये मूल्य के इंसुलिन पंप लगाए हैं जिससे उन्हें बार-बार इंजेक्शन लगाने से राहत मिलेगी।
धर्मशाला :
टांडा मेडिकल कॉलेज में अब तक 140 बच्चे पंजीकृत
डॉ. राजेंद्र प्रसाद राजकीय मेडिकल कॉलेज (आरपीजीएमसी) टांडा के पीडियाट्रिक एंडोक्राइन क्लिनिक में अब तक 140 टाइप-1 डायबिटीज पीड़ित बच्चे पंजीकृत किए जा चुके हैं। इनमें से आठ बच्चों को उन्नत चिकित्सा सुविधा के तहत इंसुलिन पंप लगाए गए हैं, जिनकी लागत लगभग तीन लाख रुपये प्रति पंप है।
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इंसुलिन पंप से बच्चों को मिलेगी नई राहत
आरपीजीएमसी के प्राचार्य और बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. मिलाप शर्मा ने बताया कि टाइप-1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून विकार है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अग्न्याशय की बीटा कोशिकाओं को नष्ट कर देती है। इंसुलिन पंप लगने से बच्चों को बार-बार इंजेक्शन लगाने से राहत मिलेगी और रोग नियंत्रण बेहतर होगा।
सात जिलों व पंजाब से आते हैं मरीज
बाल रोग विभाग की अध्यक्ष डॉ. सीमा शर्मा ने बताया कि चंबा, कुल्लू, मंडी, हमीरपुर, ऊना, कांगड़ा और पंजाब के पठानकोट से 140 बच्चे इस बीमारी के इलाज के लिए टांडा में पंजीकृत हैं। यह सुविधा प्रदेश के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।
देश के पहले डीएम इन पीडियाट्रिक एंडोक्राइनोलॉजी टांडा में
बाल एंडोक्राइन विशेषज्ञ डॉ. अतुल गुप्ता, जो देश के पहले डीएम इन पीडियाट्रिक एंडोक्राइनोलॉजी हैं (पीजीआईएमईआर चंडीगढ़), ने बताया कि यह रोग छह माह से 18 वर्ष तक के बच्चों में हो सकता है। उन्होंने चेताया कि इलाज न होने पर डायबिटिक कीटोएसिडोसिस जैसी जानलेवा स्थिति बन सकती है।
सरकारी सहयोग से संभव हुई अत्याधुनिक सुविधा
इंसुलिन पंप सुविधा भारत सरकार, हिमाचल प्रदेश सरकार और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) शिमला के समन्वय से शुरू की गई है। पंप लगाने से पहले बच्चों और अभिभावकों को प्रशिक्षण भी दिया गया। अब मरीजों को बाहर बड़े शहरों में रेफर करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
माता-पिता ने जताया आभार
लाभान्वित बच्चों के अभिभावकों ने आरपीजीएमसी टांडा की टीम — डॉ. मिलाप शर्मा, डॉ. सीमा शर्मा और डॉ. अतुल गुप्ता — का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस तरह की अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधा कांगड़ा में मिलने से बच्चों की जीवन-गुणवत्ता बेहतर होगी और गंभीर जटिलताएँ घटेंगी।
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