वामन द्वादशी मेला खत्म होने के बाद दुकानदारों से ‘दान’ क्यों?
महंगे प्लाट के बाद अतिरिक्त दिनों में नुकसान की भरपाई की उम्मीद, सामने आईं राशि वसूली की पर्चियां
हिमाचल नाऊ न्यूज सराहां
राज्य स्तरीय वामन द्वादशी मेला सराहां 25 सितंबर को आधिकारिक रूप से समाप्त हो चुका है, लेकिन मेला स्थल पर अब भी दुकानें और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां चल रही हैं। मेला समाप्ति के बाद दुकानदारी जारी रहने के साथ दुकानदारों से ली जा रही अतिरिक्त राशि को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि सामने आई पर्ची पर राशि के सामने ‘दान’ लिखा गया है, जबकि प्रशासन इसे तहबाजारी के तहत लिया जा रहा शुल्क बता रहा है।
मेले में दुकानें लगाने वाले कारोबारी अपने-अपने प्लाट की निर्धारित राशि पहले ही जमा कर चुके हैं। ऐसे में मेले की आधिकारिक अवधि खत्म होने के बाद मिलने वाला अतिरिक्त समय दुकानदारों के लिए कारोबार बढ़ाने और शुरुआती निवेश से हुए नुकसान की भरपाई का मौका माना जाता है। महंगे प्लाट लेने के बाद दुकानदारों को उम्मीद रहती है कि अतिरिक्त दिनों की बिक्री से उन्हें कुछ राहत मिलेगी। लेकिन इन्हीं अतिरिक्त दिनों में दोबारा राशि लिए जाने की शिकायत ने पूरे मामले को चर्चा में ला दिया है।
‘दान’ की पर्ची ने खड़े किए सवाल
मामले में सबसे अहम सवाल उस पर्ची को लेकर है, जो सामने आई है। पर्ची पर राशि प्राप्त करने के साथ ‘दान’ शब्द लिखा गया है। दुकानदारों के अनुसार उनसे एक हजार से दो हजार रुपये तक की राशि ली जा रही है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि यदि यह राशि तहबाजारी शुल्क है तो पर्ची पर शुल्क की संबंधित मद स्पष्ट क्यों नहीं की गई। दूसरी ओर, अगर इसे वास्तव में दान बताया जा रहा है तो निर्धारित रकम की वसूली किस आधार पर की जा रही है।
दुकानदार की पहचान सुरक्षित रखने के लिए पर्ची पर उसका नाम और सीरियल नंबर छिपाया गया है, ताकि शिकायत सामने आने के बाद संबंधित व्यक्ति को किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े।
अतिरिक्त दिनों की व्यवस्था और शर्तें स्पष्ट क्यों नहीं?
दुकानदारों का कहना है कि अगर मेला समाप्त होने के बाद उन्हें अतिरिक्त समय में दुकानें लगाने की अनुमति दी जा रही थी और उसके लिए अलग से तहबाजारी शुल्क निर्धारित था, तो इसकी जानकारी पहले ही स्पष्ट रूप से दी जानी चाहिए थी। उनका तर्क है कि प्लाट का भुगतान पहले ही किया जा चुका है और अतिरिक्त दिनों में दुकानदारी उनके लिए नुकसान की भरपाई का अवसर होती है।
ऐसे में अतिरिक्त अवधि के लिए अलग शुल्क निर्धारित किया गया है तो उसकी दर, अवधि, वसूली की मद और संबंधित नियम दुकानदारों के सामने स्पष्ट होने चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि वसूली गई रकम किस खाते में जमा की जा रही है और उसका आधिकारिक लेखा-जोखा किस प्रकार रखा जाएगा।
एसडीएम का स्पष्टीकरण- चंदा नहीं, तय प्रस्ताव के अनुसार तहबाजारी
इस मामले में एसडीएम सराहां डॉ. प्रियंका चंद्रा ने कहा कि किसी प्रकार का चंदा नहीं लिया जा रहा है। उनके अनुसार दुकानदार ने जितनी जगह का इस्तेमाल किया है, उसके आधार पर मेला कमेटी में तय प्रस्ताव के अनुसार नियमों के तहत तहबाजारी राशि ली जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकार की चंदे की पर्ची नहीं काटी जा रही।
हालांकि प्रशासन के इस स्पष्टीकरण के बाद भी पर्ची पर दर्ज ‘दान’ शब्द को लेकर सवाल बना हुआ है। यदि वसूली तहबाजारी शुल्क के रूप में हो रही है तो पर्ची पर उसी मद का स्पष्ट उल्लेख होना और दुकानदार को यह जानकारी मिलना कि राशि किस प्रस्ताव या नियम के तहत ली जा रही है, पारदर्शिता के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
25 सितंबर के बाद दुकानदारी की अनुमति किस आधार पर?
पूरे मामले का एक दूसरा अहम पहलू यह भी है कि 25 सितंबर को मेला आधिकारिक रूप से समाप्त हो चुका है, इसके बावजूद मेला स्थल पर व्यावसायिक गतिविधियां किस आदेश के तहत जारी हैं। यदि प्रशासन ने अतिरिक्त समय देने का निर्णय लिया है तो उसकी अवधि, शर्तें और शुल्क की व्यवस्था भी स्पष्ट की जानी चाहिए।
दुकानदारों के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्लाट का भुगतान वे पहले ही कर चुके हैं। मेला समाप्ति के बाद अतिरिक्त दिन मिलने से जहां उन्हें कारोबार के जरिए नुकसान की भरपाई की उम्मीद थी, वहीं उन्हीं दिनों में अतिरिक्त राशि लिए जाने से अब सवाल खड़े हो रहे हैं।
अब मेला कमेटी के प्रस्ताव, अतिरिक्त अवधि के आदेश, निर्धारित तहबाजारी दर, वसूली रजिस्टर और आय-व्यय के रिकॉर्ड से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि 25 सितंबर के बाद दुकानदारी किस व्यवस्था के तहत जारी रखी गई, दुकानदारों से ली जा रही राशि किस मद में है और पर्ची पर ‘दान’ शब्द क्यों दर्ज किया गया।