वोटर लिस्ट का शुद्धिकरण जरूरी है, लेकिन क्या पहले जांच व्यवस्था का शुद्धिकरण नहीं होना चाहिए?
SIR में उठते सवालों के बीच सबसे बड़ा प्रश्न—प्रारंभिक स्तर पर गलती की गुंजाइश इतनी अधिक क्यों, और सुधार की जिम्मेदारी आखिर मतदाता पर ही क्यों?
डेस्क
मतदाता सूची किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी नींव है। इसमें मृत, डुप्लीकेट अथवा स्थायी रूप से स्थानांतरित लोगों के नाम बने रहना निश्चित रूप से व्यवस्था की कमजोरी है। इसलिए मतदाता सूचियों का समय-समय पर गहन पुनरीक्षण होना चाहिए। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की मूल भावना पर भी सवाल नहीं होना चाहिए।
लेकिन असली सवाल SIR के उद्देश्य से नहीं, उसकी प्रक्रिया और उसके परिणामों की विश्वसनीयता से जुड़ा है।
जब किसी बड़े प्रशासनिक अभियान के दौरान लाखों-करोड़ों मतदाताओं के रिकॉर्ड को दोबारा जांचा जा रहा हो, तब सबसे महत्वपूर्ण कसौटी यह होनी चाहिए कि प्रारंभिक जांच कितनी सटीक है। यदि प्रारंभिक स्तर पर किसी पात्र मतदाता का नाम संदिग्ध मान लिया जाता है, उसे नोटिस दिया जाता है और फिर उसे अपने नाम को बचाने के लिए अपील करनी पड़ती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि जांच की जिम्मेदारी व्यवस्था की थी या नागरिक की?
91 प्रतिशत का आंकड़ा एक बड़ा सवाल छोड़ जाता है
पश्चिम बंगाल में SIR से संबंधित अपीलीय प्रक्रिया के आंकड़े इस बहस को और गंभीर बनाते हैं। उपलब्ध आरटीआई जानकारी के अनुसार 7 अगस्त 2026 तक अपीलीय अधिकरणों में निस्तारित 82,782 मामलों में करीब 91 प्रतिशत मामलों में मतदाताओं के नाम बहाल करने के आदेश हुए।
यह आंकड़ा पूरे देश की स्थिति का प्रतिनिधित्व नहीं करता और इसे पूरे SIR अभियान में हुई गलतियों का प्रतिशत भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था के नजरिए से यह आंकड़ा एक महत्वपूर्ण चेतावनी जरूर है।
यदि किसी प्रक्रिया के प्रारंभिक स्तर पर हटाए या संदिग्ध माने गए मतदाताओं में से अपीलीय स्तर पर इतनी बड़ी संख्या में लोग पात्र पाए जा रहे हैं, तो सबसे पहला सवाल यह होना चाहिए कि प्रारंभिक जांच की गुणवत्ता को और बेहतर क्यों न किया जाए?
आखिर किसी नागरिक को पहले सूची से बाहर होने की स्थिति का सामना करना पड़े, फिर नोटिस मिले, फिर दस्तावेज जुटाने पड़ें और उसके बाद अपील करके अपना नाम वापस हासिल करना पड़े—क्या यह व्यवस्था का आदर्श मॉडल हो सकता है?
पहले ‘फिल्टर’ को मजबूत करने की जरूरत
SIR की प्रक्रिया को यदि एक फिल्टर की तरह समझें तो पहला फिल्टर बूथ स्तर पर होना चाहिए। यहीं सबसे ज्यादा सावधानी की आवश्यकता है।
किसी मतदाता को मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित या डुप्लीकेट मानने से पहले केवल डिजिटल रिकॉर्ड अथवा पुराने डेटाबेस की तुलना को अंतिम आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।
कम से कम तीन स्तरों पर सत्यापन होना चाहिए…
पहला—डिजिटल रिकॉर्ड का मिलान।नाम, उम्र, पता, परिवार के सदस्यों, पुराने मतदाता रिकॉर्ड और अन्य उपलब्ध चुनावी विवरणों का तकनीकी मिलान हो।
दूसरा—भौतिक सत्यापन।यदि किसी व्यक्ति को अनुपस्थित अथवा स्थानांतरित बताया जा रहा है तो स्थानीय स्तर पर वास्तविक सत्यापन होना चाहिए। केवल एक दौरे में घर बंद मिलने को स्थायी अनुपस्थिति का आधार नहीं बनाया जा सकता।
तीसरा—मानवीय समीक्षा।जहां डिजिटल रिकॉर्ड और जमीनी जानकारी में अंतर मिले, वहां स्वतः नाम हटाने के बजाय मानव स्तर पर दोबारा जांच होनी चाहिए।
घर बंद मिला तो नागरिक गायब नहीं हो जाता
भारत जैसे देश में बड़ी संख्या में लोग रोजगार के लिए एक शहर से दूसरे शहर जाते हैं। कोई व्यक्ति कुछ महीने गांव में रहता है, फिर रोजगार के लिए दूसरे राज्य में चला जाता है। कोई छात्र हॉस्टल में रहता है। कोई बुजुर्ग अस्पताल में उपचार करा रहा होता है।
कोई परिवार किराये के मकान में रहने के कारण कुछ समय के लिए स्थान बदल देता है।ऐसे में घर पर नहीं मिला व्यक्ति और स्थायी रूप से स्थानांतरित व्यक्ति एक ही श्रेणी नहीं हो सकते।इसलिए किसी मतदाता की अनुपस्थिति को स्थायी स्थानांतरण मानने से पहले पर्याप्त समय और कम से कम दो स्तर का सत्यापन होना चाहिए।
पुराने रिकॉर्ड हर नागरिक के पास होना संभव नहीं
SIR की एक और बड़ी चुनौती पुराने मतदाता रिकॉर्ड से लिंक स्थापित करने की है।देश के करोड़ों गरीब, प्रवासी, ग्रामीण और बुजुर्ग नागरिकों के पास कई दशक पुराने दस्तावेज नहीं हो सकते। कुछ लोगों के नाम पुराने रिकॉर्ड में अलग वर्तनी से दर्ज हो सकते हैं।
किसी के पिता का नाम बदला हुआ हो सकता है, किसी के पते में अंतर हो सकता है और किसी महिला के विवाह के बाद उसका निवास बदल गया हो सकता है।ऐसे मामलों में दस्तावेजों की कमी को सीधे संदेह का आधार बनाने के बजाय परिवार, स्थानीय निवास, पड़ोस और उपलब्ध अन्य रिकॉर्ड के माध्यम से सत्यापन की वैकल्पिक व्यवस्था होनी चाहिए।
लोकतंत्र में दस्तावेज महत्वपूर्ण हैं, लेकिन दस्तावेजों की अनुपलब्धता को नागरिक की गलती मान लेना उचित नहीं होगा।
बीएलओ पर अत्यधिक निर्भरता भी जोखिम
SIR का सबसे महत्वपूर्ण काम बूथ लेवल अधिकारी के कंधों पर है। लेकिन सवाल यह भी है कि एक बीएलओ के पास कितने मतदाताओं की जिम्मेदारी है, उसे कितना समय मिला है और उसे कितनी तकनीकी एवं प्रशासनिक सहायता दी गई है?यदि हजारों मतदाताओं के रिकॉर्ड की जांच सीमित समय में करनी है तो स्वाभाविक रूप से गलती की संभावना बढ़ेगी।
इसलिए SIR को सफल बनाने के लिए केवल बीएलओ को लक्ष्य देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें—पर्याप्त समय,स्पष्ट प्रशिक्षण,तकनीकी सहायता,पुराने रिकॉर्ड तक आसान पहुंच,कठिन मामलों में वरिष्ठ अधिकारी की सहायता मिलना जरूरी है।
‘संदिग्ध’ और ‘अपात्र’ में अंतर जरूरी
सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक यह होना चाहिए कि किसी मतदाता को केवल रिकॉर्ड में विसंगति मिलने के कारण ‘अपात्र’ न माना जाए।उसे पहले ‘सत्यापन आवश्यक’ श्रेणी में रखा जाए।इसके बाद नागरिक को पर्याप्त समय दिया जाए।
यदि नागरिक निर्धारित प्रक्रिया में जवाब नहीं देता, तभी अगला कदम उठाया जाए।यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटना केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है। इसका सीधा संबंध उसके संवैधानिक लोकतांत्रिक अधिकार से है।
अपील अंतिम सुरक्षा कवच नहीं, शुरुआती जांच बेहतर होनी चाहिए
अपीलीय व्यवस्था लोकतंत्र में जरूरी है। लेकिन यह मान लेना कि गलती हो जाए तो नागरिक अपील कर लेगा, पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।
अपील गलती सुधारने का रास्ता है, गलती करने की अनुमति नहीं।
यदि प्रारंभिक स्तर पर जांच मजबूत होगी तो अपीलों की संख्या भी कम होगी और प्रशासनिक बोझ भी घटेगा।इसलिए सरकार, निर्वाचन आयोग और राजनीतिक दलों की बहस का केंद्र यह नहीं होना चाहिए कि कितने नाम काटे गए।
असली सवाल होना चाहिए—कितने नाम गलत तरीके से संदिग्ध बनाए गए?कितने लोग समय पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर पाए?कितने नाम अपील के बाद बहाल हुए?और कितने पात्र नागरिक प्रक्रिया की जटिलता के कारण अपना नाम वापस नहीं जुड़वा पाए?यही आंकड़े SIR की वास्तविक सफलता या कमजोरी का मूल्यांकन करेंगे।
पहले पायलट, फिर व्यापक विस्तार
इतने बड़े पैमाने पर मतदाता सूची के पुनरीक्षण से पहले एक और महत्वपूर्ण सुधार किया जा सकता था—चरणबद्ध पायलट मॉडल।पहले सीमित जिलों या निर्वाचन क्षेत्रों में पूरी प्रक्रिया लागू की जाती। वहां से सामने आई तकनीकी और प्रशासनिक गलतियों का स्वतंत्र मूल्यांकन होता।
उसके बाद आवश्यक सुधार करके अगले चरण में इसे विस्तारित किया जाता।इससे किसी तकनीकी गलती का असर एक साथ करोड़ों मतदाताओं पर पड़ने का जोखिम कम होता।
स्वतंत्र ऑडिट क्यों नहीं?
SIR की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए एक स्वतंत्र तकनीकी और प्रशासनिक ऑडिट भी उपयोगी हो सकता है।इसमें यह जांच हो कि—
.कितने नाम गलत तरीके से संदिग्ध श्रेणी में गए?
किस कारण से गए?कितने नाम अपील के बाद बहाल हुए?किन क्षेत्रों में गलती की दर अधिक रही?डिजिटल मिलान में किस प्रकार की विसंगतियां सामने आईं? बीएलओ स्तर पर कितने मामलों में पुनः सत्यापन करना पड़ा?यदि इन आंकड़ों को राज्यवार और जिला स्तर पर सार्वजनिक किया जाए तो SIR को लेकर उठ रहे संदेह काफी हद तक दूर किए जा सकते हैं।
यदि इन आंकड़ों को राज्यवार और जिला स्तर पर सार्वजनिक किया जाए तो SIR को लेकर उठ रहे संदेह काफी हद तक दूर किए जा सकते हैं।मतदाता सूची साफ हो, लेकिन मतदाता न छूटेSIR का लक्ष्य यदि मतदाता सूची को अधिक शुद्ध बनाना है तो यह स्वागत योग्य उद्देश्य है।
लेकिन किसी भी शुद्धिकरण अभियान की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि उसमें कितने नाम हटाए गए।सफलता की असली कसौटी यह होगी कि एक भी पात्र मतदाता अनावश्यक प्रशासनिक प्रक्रिया, तकनीकी गलती, दस्तावेजों की कमी अथवा सत्यापन की कमजोरी के कारण अपने मताधिकार से वंचित न हो।
इसलिए समय की जरूरत SIR को रोकने या उसका विरोध करने की नहीं, बल्कि उसे और ज्यादा पारदर्शी, मानवीय, चरणबद्ध और त्रुटि-रोधी बनाने की है।निर्वाचन आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होनी चाहिए कि वह मतदाता सूची को साफ करने के साथ-साथ नागरिक का भरोसा भी बनाए रखे।
क्योंकि लोकतंत्र में गलत नाम का सूची में रह जाना एक समस्या है, लेकिन सही मतदाता का सूची से बाहर हो जाना उससे कहीं अधिक गंभीर प्रशासनिक विफलता बन सकता है।और इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यही है—SIR में कितने नाम हटे, यह नहीं; सवाल यह है कि जो नाम हटाए गए, उनमें कितने वास्तव में हटाए जाने योग्य थे?
और यदि अपील के बाद बड़ी संख्या में नाम वापस जुड़ रहे हैं, तो क्या अब प्रारंभिक जांच की पूरी प्रक्रिया का स्वतंत्र और गंभीर निरीक्षण नहीं होना चाहिए?