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हिमालयी क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण और विकास के संतुलन के लिए नीति की जरूरत पर लोकसभा में चर्चा

By हिमांचलनाउ डेस्क नाहन Published: 16 Mar 2026, 1:53 PM | Updated: 16 Mar 2026, 1:53 PM 1 min read

पहाड़ी राज्यों के लिए अलग पर्यावरण नीति की आवश्यकता का मुद्दा लोकसभा में उठाया : सुरेश कश्यप

लोकसभा सांसद सुरेश कश्यप ने पहाड़ी राज्यों की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए अलग पर्यावरण नीति बनाए जाने की आवश्यकता उठाई। उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती विकास गतिविधियों के बीच पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के उपायों पर सरकार से जानकारी मांगी।

शिमला

लोकसभा में उठाया मुद्दा

भाजपा के लोकसभा सांसद सुरेश कश्यप ने लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान पहाड़ी राज्यों के लिए अलग पर्यावरण नीति बनाए जाने की आवश्यकता का मुद्दा उठाया। उन्होंने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से हिमाचल प्रदेश सहित अन्य हिमालयी राज्यों में बढ़ते पर्यटन, औद्योगिक गतिविधियों और आधारभूत ढांचे के विस्तार के बीच पर्यावरण संरक्षण के लिए उठाए जा रहे कदमों के बारे में जानकारी मांगी।

बढ़ती पर्यावरणीय चुनौतियों पर चिंता

सुरेश कश्यप ने कहा कि पहाड़ी राज्यों में अपशिष्ट प्रबंधन, वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण जैसी चुनौतियां तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों और पारिस्थितिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए अलग और व्यावहारिक पर्यावरण नीति बनाए जाने की आवश्यकता है।

केंद्रीय मंत्री ने दिया जवाब

सांसद के प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने लोकसभा में बताया कि भारतीय हिमालयी क्षेत्र देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र न केवल पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए जीवन समर्थन प्रणाली प्रदान करता है बल्कि मैदानी इलाकों की बड़ी आबादी के लिए जल, जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाता है।

पर्यावरणीय अध्ययन जारी

उन्होंने बताया कि मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत जी.बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान द्वारा भारतीय हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरणीय स्थितियों का लगातार अध्ययन किया जा रहा है। इसके तहत वायु गुणवत्ता, जल गुणवत्ता, ध्वनि स्तर और मानव गतिविधियों के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया जाता है, ताकि नीतिगत स्तर पर आवश्यक सुधार किए जा सकें।

पर्यावरण संतुलन के लिए नियम

केंद्रीय मंत्री ने बताया कि पर्यावरण प्रभाव आकलन प्रक्रिया, वन संरक्षण से जुड़े नियम, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के प्रावधान और संवेदनशील क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए तय मानकों के माध्यम से पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के प्रयास किए जा रहे हैं। इन प्रावधानों के तहत किसी भी विकास परियोजना को वैज्ञानिक अध्ययन और पर्यावरणीय मानकों के आधार पर ही अनुमति दी जाती है।

प्रदूषण नियंत्रण के लिए दिशा-निर्देश

उन्होंने बताया कि निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट प्रबंधन, धूल नियंत्रण और प्रदूषण नियंत्रण के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा भी विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत देश के 130 शहरों में वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए कार्ययोजनाएं तैयार की गई हैं, जिनमें हिमालयी क्षेत्र के शहर भी शामिल हैं।

जिम्मेदार पर्यटन को बढ़ावा

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में सतत और जिम्मेदार पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए भी राष्ट्रीय स्तर पर रणनीतियां तैयार की गई हैं। इसके तहत जल स्रोतों की सुरक्षा, जैव विविधता संरक्षण, मृदा अपरदन रोकने, अपशिष्ट प्रबंधन और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

विकास और पर्यावरण संतुलन जरूरी

सांसद सुरेश कश्यप ने कहा कि हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां मैदानी राज्यों से भिन्न होती हैं, इसलिए इन क्षेत्रों के लिए विशेष नीति और अलग दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।

केंद्र सरकार के प्रयास

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार हिमालयी क्षेत्रों के सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के लिए लगातार प्रयास कर रही है। आने वाले समय में पहाड़ी राज्यों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए और भी प्रभावी नीतियां लागू की जाएंगी, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ क्षेत्र के लोगों के विकास और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।