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1982 के बाद एक बार फिर कांग्रेस के तारणहार बनेंगे मुसाफिर

PARUL 20 Apr 2024 Edited 20 Apr 1 min read

सात बार के विधायक एवं कैबिनेट मंत्री रहे मुसाफिर की घर वापसी पर भाजपा खेमे में हलचल

HNN/नाहन

भारी दलबल के साथ 2022 के बाद गंगू राम मुसाफिर की घर वापसी ने भाजपा खेमे में संकट खड़ा कर दिया है। 1982 में वन विभाग की नौकरी से इस्तीफा देने के बाद निर्दलीय चुनाव जीत मुसाफिर अल्पमत रही कांग्रेस सरकार के लिए सरकार बनाने में अहम साबित हुए थे। वहीं निष्कासन के बाद उनकी वापसी कांग्रेस के लिए एक बार फिर तारणहारी साबित होने जा रही है।

मुसाफिर की घर वापसी के बाद भाजपा प्रत्याशी की लोकसभा चुनाव में दिक्कतें भी बढ़ती हुई नजर आती हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि जिस विधानसभा क्षेत्र पच्छाद से भाजपा प्रत्याशी सुरेश कश्यप तालुक रखते हैं उसी से गंगू राम मुसाफिर भी संबंध रखते हैं।

बता दें कि गंगूराम मुसाफिर पहले वन विभाग में नौकरी करते थे, 1982 में वह नौकरी से इस्तीफा देकर निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे थे। उस दौरान चुनाव में कांग्रेस के पास बहुमत नहीं था लिहाजा जीआर मुसाफिर के समर्थन से सरकार बनी थी। मुसाफिर को उस दौरान मंत्री भी बनाया गया था। जीआर मुसाफिर 1985 से 2007 तक कांग्रेस के टिकट पर विधायक रहे हैं।

मुसाफिर को सबसे पहले वन एवं उद्योग फिर शिक्षा मंत्री, सहकारिता विभाग मंत्री, परिवहन मंत्रालय और ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री भी बनाया गया। 2003 से लेकर 2008 तक मुसाफिर विधानसभा अध्यक्ष रहे। 2009 में शिमला संसदीय लोकसभा सीट पर उतर गया था जिसमें उनकी हार हुई थी। इस सीट पर सोलन से ताल्लुक रखने वाले हिविका प्रत्याशी डॉ. धनीराम शांडिल की जीत हुई थी। दूसरी बाद डॉ. धनीराम शांडिल कांग्रेस की सीट पर संसद बने।

उसके बाद वीरेंद्र कश्यप दो बार शिमला संसदीय सीट पर सांसद रहे। तीसरी बार उनकी जगह सुरेश कश्यप को टिकट दिया गया था। जिसमें सुरेश कश्यप की जीत हुई थी। गंगूराम मुसाफिर पूर्व मुख्यमंत्री रहे स्वर्गीय वीरभद्र सिंह के हनुमान भी कहलाते थे। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के द्वारा 2017 में उन्हें योजना बोर्ड का उपाध्यक्ष बनाया गया था। मुसाफिर 2012,2017, 2019 के उपचुनाव में और 2022 में वह निर्दलीय लड़े थे इन सभी चुनावों में उनकी हार हुई थी।

विधायक रहे सुरेश कश्यप के सांसद बनने के बाद पच्छाद विधानसभा क्षेत्र के लिए उप चुनाव हुआ था। इस उप चुनाव में भाजपा प्रत्याशी रीना कश्यप जीती थी जबकि मुसाफिर की जगह भाजपा से कांग्रेस में आई दयाल प्यारी को मैदान में उतर गया था। मुसाफिर ने पार्टी से बगावत करते हुए बतौर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और हार गए थे।

अब यदि मुसाफिर उपचुनाव में बगावत न करते तो निश्चित ही दयाल प्यारी भारी मतों से विजय होती। मुसाफिर का आज भी अपने विधानसभा क्षेत्र में बड़ा मजबूत आधार है और अच्छा वोट बैंक भी है। मुसाफिर की घर वापसी के बाद पूरे विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस एकजुट हो चुकी है।

वहीं भाजपा में गुट बाजी के चलते वह साथ ही पूर्व में रही भाजपा सरकार के दौरान कार्यकर्ताओं की अनदेखी आज भी नाराजगी का बड़ा कारण बनी हुई है। मुसाफिर की एंट्री से पहले सुरेश कश्यप की स्थिति इस विधानसभा क्षेत्र में लगभग अच्छी बनी हुई थी। मुसाफिर की घर वापसी के बाद भाजपा में रूठे हुए को मनाना कश्यप के लिए चुनौती भी बनेगी।

मुसाफिर करीब 40 वर्षों के बाद 2022 के चुनाव में निर्दलीय मैदान में उतरे थे। चुनाव में हार के बाद उनके समर्थक उनके साथ मजबूत स्तंभ की तरह जुड़े रहे। वहीं कांग्रेस प्रत्याशी रही दयाल प्यारी को भी बड़ी नसीहत मिली कि बिना मुसाफिर उनकी चुनावी बस शिमला विधानसभा भवन तक नहीं पहुंच सकती। बरहाल मुसाफिर की घर वापसी के बाद न केवल कांग्रेसी खेमे में उत्साह है बल्कि मुख्यमंत्री के चेहरे पर भी तनाव का असर कम लग रहा है।