Loading...

2008 से अटकी किशाऊ परियोजना पर हिमाचल ने मनवाई अपनी शर्तें, बिना खर्च के हर साल 1200 करोड़ की उम्मीद

Shailesh Saini • 5 Hours Ago • 1 Min Read

हिमाचल नाऊ न्यूज़ | नई दिल्ली

फाइलों और राज्यों के बीच सहमति के इंतजार में अटकी किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को अब नई रफ्तार मिलने जा रही है। टोंस नदी पर प्रस्तावित 422 मेगावाट की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर हिमाचल प्रदेश ने अपने हितों से समझौता किए बिना ऐसा वित्तीय रास्ता तैयार कराया है, जिससे राज्य पर परियोजना के बिजली घटक का अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा और भविष्य में करीब 1200 करोड़ रुपये सालाना आय का रास्ता खुलने की उम्मीद है।

करीब 15,624 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली किशाऊ परियोजना हिमाचल और उत्तराखंड की सीमा पर प्रस्तावित है। परियोजना को लेकर लंबे समय से सबसे बड़ी पेच बिजली घटक की लागत और हिमाचल के हिस्से को लेकर बनी हुई थी। राज्य सरकार की ओर से लगातार यह मुद्दा उठाया जाता रहा कि हिमाचल अपने हिस्से की बिजली के लिए भारी आर्थिक बोझ क्यों उठाए, जबकि परियोजना का पानी दूसरे राज्यों के हितों में भी इस्तेमाल होना है।

अब उच्चस्तरीय स्तर पर हुए समझौते के बाद इस अड़चन को दूर करने का रास्ता साफ हुआ है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की ओर से परियोजना में हिमाचल के आर्थिक हितों को प्राथमिकता देने की बात लगातार रखी गई थी। सरकार के अनुसार हिमाचल के हिस्से की बिजली की लागत का भार लाभार्थी राज्यों की ओर से उठाया जाएगा। इससे हिमाचल को परियोजना में अपनी हिस्सेदारी के लिए अतिरिक्त वित्तीय दबाव से राहत मिलने की संभावना है।

211 मेगावाट बिजली के साथ सालाना आय का बड़ा हिस्सा

किशाऊ परियोजना से हिमाचल प्रदेश को करीब 211 मेगावाट बिजली मिलने का प्रावधान है। खास बात यह है कि राज्य को इस बिजली के उत्पादन से जुड़ी लागत का पूरा बोझ स्वयं नहीं उठाना पड़ेगा। सरकार के अनुसार परियोजना से हिमाचल को हर वर्ष करीब 1200 करोड़ रुपये की आय होने की संभावना है। यही वजह है कि किशाऊ परियोजना को अब केवल बिजली उत्पादन की योजना के बजाय हिमाचल की दीर्घकालीन आर्थिक हिस्सेदारी से जोड़कर देखा जा रहा है।

सरकार का तर्क है कि यदि परियोजना के लिए हिमाचल को अपनी सीमित वित्तीय संसाधनों से बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती तो यह राज्य के लिए अतिरिक्त आर्थिक दबाव बन सकता था। लेकिन नए समझौते में बिजली घटक की लागत को लाभार्थी राज्यों से वहन कराने की व्यवस्था बनने के बाद हिमाचल के लिए तस्वीर काफी अलग दिखाई दे रही है।

पानी हिमाचल का, लाभ कई राज्यों का; अब लागत का हिस्सा भी दूसरे उठाएंगे

किशाऊ परियोजना का महत्व केवल हिमाचल तक सीमित नहीं है। टोंस नदी पर बनने वाला यह बांध दिल्ली समेत हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और अन्य संबंधित क्षेत्रों की पानी की जरूरतों को पूरा करने वाली बहुउद्देशीय परियोजना के तौर पर देखा जा रहा है। परियोजना से सिंचाई और पेयजल आपूर्ति के साथ बिजली उत्पादन का भी प्रावधान है।

यही कारण है कि हिमाचल सरकार ने बातचीत के दौरान अपने हिस्से और राज्य पर पड़ने वाले वित्तीय भार को प्रमुख मुद्दा बनाया। अब जिन राज्यों को परियोजना के पानी से लाभ मिलना है, उनके सामने परियोजना के वित्तीय पक्ष में भी भागीदारी की व्यवस्था किए जाने से हिमाचल के लिए यह समझौता महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

422 मेगावाट बिजली, करीब 97 हजार हेक्टेयर सिंचाई का लक्ष्य

किशाऊ परियोजना की स्थापित क्षमता 422 मेगावाट है। परियोजना से बड़े क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के साथ दिल्ली समेत कई राज्यों की पेयजल जरूरतों को पूरा करने की योजना है। इसके अलावा परियोजना से बड़ी मात्रा में बिजली उत्पादन भी प्रस्तावित है।

हिमाचल के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि परियोजना से मिलने वाले लाभ के साथ राज्य पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ को लेकर सरकार ने अपनी स्थिति स्पष्ट रखी है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने भी इस मुद्दे पर राज्य के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही है।

अब किशाऊ परियोजना के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं रह गया है कि राज्यों के बीच सहमति बनेगी या नहीं, बल्कि यह है कि वर्षों से अटकी परियोजना की अगली मंजूरियां कितनी तेजी से पूरी होती हैं और जमीन पर निर्माण कब शुरू होता है। यदि तय वित्तीय व्यवस्था के अनुसार परियोजना आगे बढ़ती है तो हिमाचल के लिए यह बिना बड़े अतिरिक्त खर्च के दीर्घकालीन आय और बिजली का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन सकती है।

Related Topics: