BBMB / सुप्रीम कोर्ट से हिमाचल को बड़ी राहत, बिजली के रूप में मिलेगा बकाया; पंजाब से मांगा जवाब
भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) परियोजनाओं में हिमाचल प्रदेश के हिस्से को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद में राज्य को बड़ी राहत मिली है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कैशलेस सेटलमेंट का प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत हिमाचल को लंबित बकाया राशि नकद की बजाय बिजली के रूप में दी जाएगी। इस प्रस्ताव पर हिमाचल प्रदेश और हरियाणा ने सहमति जताई है, जबकि पंजाब ने आपत्ति दर्ज कराई है।
नई दिल्ली/शिमला
बिजली के रूप में मिलेगा लंबित बकाया
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने बताया कि हिमाचल प्रदेश को बीबीएमबी परियोजनाओं से मिलने वाला लंबित बकाया नकद भुगतान के बजाय बिजली के रूप में दिया जा सकता है। अदालत को बताया गया कि हिमाचल प्रदेश और हरियाणा सरकारें इस प्रस्ताव से सिद्धांततः सहमत हैं, जबकि पंजाब सरकार ने इस पर आपत्ति जताई है।
पंजाब से दो सप्ताह में मांगा जवाब
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार से कहा कि वह न्यायालय के आदेशों का पालन करते हुए दो सप्ताह के भीतर अपना स्पष्ट पक्ष रखे। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 12 अगस्त तय की है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि राज्यों के बीच सहमति नहीं बनती है तो वह मामले का गुण-दोष के आधार पर फैसला सुनाएगी।
करीब 13,066 मिलियन यूनिट बिजली का है बकाया
जानकारी के अनुसार, वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने बीबीएमबी परियोजनाओं से हिमाचल प्रदेश का बिजली हिस्सा 7.19 प्रतिशत तय किया था। हालांकि 1966 से 2011 तक की अवधि का बकाया अब भी लंबित है, जो लगभग 13,066 मिलियन यूनिट बिजली के बराबर बताया गया है। केंद्र सरकार ने सुझाव दिया है कि पंजाब और हरियाणा इस बकाये का भुगतान बिजली के रूप में करें, जिसमें 12,000 मिलियन यूनिट से अधिक बिजली हिमाचल को मिल सकती है।
420 करोड़ रुपये का बोझ भी होगा कम
प्रस्ताव के अनुसार बीबीएमबी परियोजनाओं की पूंजीगत लागत के रूप में पंजाब और हरियाणा को देय करीब 420 करोड़ रुपये भी बिजली बकाये में समायोजित किए जाएंगे। इससे हिमाचल प्रदेश पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा और राज्य को दोहरा लाभ मिलने की संभावना है।
पंजाब ने दरों पर जताई आपत्ति
पंजाब सरकार ने अदालत में कहा कि बकाये की गणना के लिए प्रस्तावित 2.50 रुपये प्रति यूनिट की दर अधिक है। राज्य का तर्क है कि इस दर के लागू होने पर उसे लगभग 2,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ उठाना पड़ सकता है। इसी आधार पर पंजाब ने केंद्र के प्रस्ताव पर आपत्ति दर्ज कराई है।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिमाचल प्रदेश के पास पंजाब और हरियाणा जैसी राजस्व संभावनाएं नहीं हैं। अदालत ने यह भी कहा कि राज्य की भूमि पर स्थित नदियों और बांधों से जुड़े उसके अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती। न्यायालय ने संकेत दिया कि यदि आपसी सहमति नहीं बनती है तो वह मामले में अंतिम निर्णय स्वयं देगा।
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