Election / पांवटा में भाजपा-कांग्रेस बराबरी पर, सत्ता की चाबी निर्दलियों के हाथ
Election : नगर परिषद पांवटा साहिब में भाजपा और कांग्रेस दोनों चार-चार सीटों पर सिमट गई हैं, जबकि पांच निर्दलीय प्रत्याशी जीतकर “किंगमेकर” की भूमिका में आ गए हैं। अब अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का फैसला निर्दलीयों के समर्थन पर निर्भर करेगा।
पांवटा साहिब
नगर परिषद पांवटा साहिब के चुनाव परिणामों ने इस बार स्थानीय राजनीति की कई परतें खोल दी हैं। भाजपा का गढ़ माने जाने वाले पांवटा साहिब में न तो भाजपा स्पष्ट बहुमत हासिल कर पाई और न ही कांग्रेस सत्ता तक पहुंच सकी। 13 वार्डों वाली नगर परिषद में भाजपा और कांग्रेस दोनों चार-चार सीटों पर सिमट गईं, जबकि पांच निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत दर्ज कर पूरी सियासी तस्वीर ही बदल दी। अब नगर परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की कुर्सी निर्दलीयों के समर्थन पर तय होगी और इसी के साथ पांवटा की राजनीति में जोड़तोड़, रणनीति और अंदरूनी समीकरणों का खेल तेज हो गया है।
सबसे ज्यादा चर्चा भाजपा के प्रदर्शन को लेकर हो रही है। पांवटा साहिब को लंबे समय से भाजपा का मजबूत किला माना जाता रहा है और इसका सबसे बड़ा कारण विधायक सुखराम चौधरी का मजबूत जनाधार रहा है। लेकिन इस बार बीमारी के चलते सुखराम चौधरी चुनावी मैदान में सक्रिय भूमिका नहीं निभा पाए, जिसका असर सीधे चुनाव परिणामों में दिखाई दिया। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि सुखराम चौधरी पूरी तरह मैदान में होते तो तस्वीर कुछ और हो सकती थी।
भाजपा के भीतर संगठनात्मक स्तर पर भी इस चुनाव ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जिला भाजपा अध्यक्ष धीरज गुप्ता की रणनीति और टिकट प्रबंधन को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच ही नाराजगी की चर्चाएं तेज हैं। सबसे बड़ा झटका वार्ड नंबर 12 में देखने को मिला, जहां जिला अध्यक्ष अपनी ही बहन को जीत नहीं दिलवा सके और उन्हें 123 वोटों से हार का सामना करना पड़ा। इस हार ने संगठन की जमीनी पकड़ और नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पांवटा साहिब में भाजपा का ग्राफ पिछले कुछ समय से लगातार नीचे जा रहा है। संगठन और जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल की कमी तथा स्थानीय स्तर पर बढ़ती गुटबाजी ने भाजपा को नुकसान पहुंचाया। यही वजह रही कि कई वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने भाजपा और कांग्रेस दोनों के समीकरण बिगाड़ दिए।
दूसरी ओर कांग्रेस भी इस चुनाव में कोई बड़ा राजनीतिक संदेश देने में सफल नहीं रही। पार्टी के भीतर लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान और गुटबाजी का असर साफ नजर आया। कांग्रेस चार सीटें जीतने के बावजूद बहुमत से दूर रह गई। हालांकि पार्टी समर्थक इसे भाजपा के गढ़ में सेंध के रूप में देख रहे हैं, लेकिन निर्दलीयों की मजबूत मौजूदगी ने कांग्रेस की राह भी आसान नहीं रहने दी।
इस चुनाव की सबसे बड़ी कहानी निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत बनकर उभरी है। वार्ड नंबर 8, 9, 10, 12 और 13 से जीतकर आए निर्दलीय पार्षद अब “किंगमेकर” की भूमिका में हैं। नगर परिषद का अगला अध्यक्ष कौन होगा, यह अब इन्हीं निर्दलीयों के रुख पर निर्भर करेगा। चुनाव परिणाम आने के बाद से ही दोनों दलों के नेताओं की सक्रियता बढ़ गई है और समर्थन जुटाने के लिए अंदरखाने बैठकों का दौर शुरू हो चुका है।
पांवटा साहिब की राजनीति में यह परिणाम केवल एक नगर परिषद चुनाव का नतीजा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे आने वाले विधानसभा समीकरणों के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। भाजपा के लिए यह परिणाम चेतावनी है तो कांग्रेस के लिए भी आत्ममंथन का विषय बन गया है। वहीं निर्दलीय उम्मीदवारों की इस ताकत ने साफ कर दिया है कि जनता अब स्थानीय मुद्दों और व्यक्तिगत पकड़ को दलगत राजनीति से ऊपर रखकर फैसला लेने लगी है।
