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हिमाचल सरकार कर्मचारी एक्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट जाएगी, SLP दायर करने की तैयारी शुरू

हिमांचलनाउ डेस्क नाहन II • 28 May 2026 • 1 Min Read

हिमाचल सरकार ने कर्मचारी एक्ट मामले में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला किया है। शिक्षा विभाग को विशेष अनुमति याचिका (SLP) का ड्राफ्ट तैयार कर महाधिवक्ता से मंजूरी लेने के निर्देश दिए गए हैं। मामला अनुबंध सेवा लाभों और नियमितीकरण से जुड़े प्रावधानों से संबंधित है।

शिमला

कर्मचारी एक्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी

हिमाचल प्रदेश सरकार ने अनुबंध सेवा लाभों से जुड़े कर्मचारी एक्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख करने की तैयारी शुरू कर दी है। शिक्षा विभाग के निदेशक को निर्देश दिए गए हैं कि विशेष अनुमति याचिका (SLP) का ड्राफ्ट तैयार कर महाधिवक्ता से अनुमोदन प्राप्त करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में दायर किया जाए। यह मामला वर्ष 2024 में लागू किए गए कर्मचारी एक्ट से संबंधित है।

हाईकोर्ट ने अप्रैल 2026 में अधिनियम को किया था निरस्त

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 26 अप्रैल 2026 को कर्मचारी एक्ट को असंवैधानिक घोषित करते हुए निरस्त कर दिया था। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने लगभग 450 याचिकाओं का निपटारा करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए थे कि पात्र कर्मचारियों को तीन माह के भीतर अनुबंध सेवा लाभ प्रदान किए जाएं। अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि अधिनियम की कई धाराएं संविधान के प्रावधानों के अनुरूप नहीं थीं।

अदालत ने कानून की विभिन्न धाराओं पर उठाए थे सवाल

अदालत ने कहा था कि अधिनियम की धारा 3, 5, 6, 7, 8 और 9 संविधान के प्रावधानों के विपरीत थीं। न्यायालय के अनुसार इन धाराओं को हटाने के बाद अधिनियम का मूल स्वरूप प्रभावी नहीं रह जाता। अदालत ने इस अधिनियम के आधार पर की गई लाभ कटौती और रिकवरी संबंधी कार्रवाई को भी निरस्त कर दिया था। फैसले में यह भी कहा गया था कि राज्य विधानसभा ऐसा कानून नहीं बना सकती जो न्यायिक आदेशों के प्रभाव को समाप्त कर दे।

अनुबंध सेवा लाभ और वरिष्ठता को लेकर विवाद

अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि आरएंडपी नियमों के तहत पारदर्शी चयन प्रक्रिया से नियुक्त कर्मचारियों को नियमितीकरण के बाद अनुबंध अवधि के आधार पर वरिष्ठता और अन्य सेवा लाभ मिल सकते हैं। फैसले में 12 दिसंबर 2003 के बाद नियुक्त कर्मचारियों और उससे पहले नियुक्त कर्मचारियों के बीच लाभों में अंतर को भी भेदभावपूर्ण बताया गया था। इस मामले में ताज मोहम्मद और लेख राम बनाम हिमाचल प्रदेश से जुड़े मामलों का उल्लेख भी किया गया।

सरकार ने वित्तीय प्रभाव का दिया हवाला

राज्य सरकार की ओर से कर्मचारी एक्ट को लागू करने के पीछे संभावित वित्तीय देनदारी को एक प्रमुख कारण माना गया था। अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद सरकार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से राहत प्राप्त करने की प्रक्रिया शुरू की है। सरकार का मानना है कि अंतिम निर्णय तक वित्तीय और प्रशासनिक प्रभावों को देखते हुए मामले में शीर्ष अदालत का हस्तक्षेप आवश्यक है।

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