सिरमौर / जिमीकंद की खेती में ‘बिजामृत’ बना सफलता का मंत्र
Himachalnow / सिरमौर
जिला सिरमौर में जिमीकंद की खेती अब पारंपरिक फसल से आगे बढ़कर किसानों के लिए मुनाफे का मजबूत जरिया बनती जा रही है। खेती का सीजन शुरू होते ही कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र धौलाकुआं ने किसानों को वैज्ञानिक एवं प्राकृतिक तरीके से बीज उपचार अपनाने की सलाह जारी की है। विशेषज्ञों का कहना है कि जिमीकंद की अच्छी पैदावार केवल सही बीज से नहीं, बल्कि उसके सही उपचार से तय होती है। यही कारण है कि इस बार किसानों को विशेष रूप से ‘बिजामृत विधि’ अपनाने पर जोर दिया जा रहा है।
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प्रधान वैज्ञानिक कृषि विज्ञान केंद्र धौलाकुआं डॉ. पंकज मित्तल और कृषि उपनिदेशक जिला सिरमौर डॉ. साहब सिंह ने बताया कि खेत में बिना उपचार किए जिमीकंद लगाने से फसल में सड़न, फफूंद और कई प्रकार के रोग लगने की आशंका बढ़ जाती है। इसके विपरीत बिजामृत विधि से उपचारित बीज तेजी से अंकुरित होते हैं और पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।
उन्होंने बताया कि बिजामृत पूरी तरह प्राकृतिक जैविक उपचार पद्धति है। इसमें गाय का गोबर, गौमूत्र, गुड़, बेसन अथवा दाल का आटा और खेत की मिट्टी को मिलाकर विशेष घोल तैयार किया जाता है। जिमीकंद के कंद या बीज के टुकड़ों को इस घोल में कुछ समय तक डुबोकर रखा जाता है, जिससे उन पर मौजूद हानिकारक जीवाणु और फफूंद नष्ट हो जाते हैं। उपचार के बाद बीज को छाया में सुखाकर खेत में लगाया जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार जिमीकंद के लिए 500 से 750 ग्राम वजन वाले कंद के टुकड़े सबसे उपयुक्त माने जाते हैं। बिजामृत उपचार से बीज की गुणवत्ता बेहतर होती है, पौधों का विकास तेज होता है और उत्पादन में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखने को मिलती है। इसके साथ ही यह विधि मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और रासायनिक दवाओं के उपयोग को कम करने में भी सहायक साबित हो रही है।
डॉ. पंकज मित्तल ने बताया कि सिरमौर की जलवायु जिमीकंद उत्पादन के लिए बेहद अनुकूल है और अब किसान परंपरागत किस्मों के बजाय ‘गजेंद्र’ किस्म को तेजी से अपना रहे हैं। यह किस्म स्वाद, गुणवत्ता और कम ऑक्जेलिक एसिड के कारण बाजार में अधिक पसंद की जा रही है। वहीं डॉ. साहब सिंह ने कहा कि जिमीकंद की खेती छोटे और सीमांत किसानों के लिए आर्थिक रूप से बेहद लाभकारी सिद्ध हो रही है। वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर एक बीघा भूमि से डेढ़ लाख से दो लाख रुपये तक की आय प्राप्त की जा सकती है।
उन्होंने किसानों से अपील की कि खेती में पारंपरिक तरीकों के साथ वैज्ञानिक सलाह को भी अपनाएं, ताकि सिरमौर में जिमीकंद की खेती को नई पहचान मिल सके और किसानों की आय में स्थायी बढ़ोतरी हो।