Kishau Project / 15,624 करोड़ की परियोजना का रास्ता साफ, हिमाचल को सालाना 1,000 करोड़ से अधिक आय की उम्मीद
किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर करीब आठ वर्षों से चला आ रहा गतिरोध खत्म हो गया है। 15,624 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली 422 मेगावाट क्षमता की परियोजना के क्रियान्वयन के लिए हिमाचल प्रदेश सहित छह राज्यों ने नई दिल्ली में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। राज्य सरकार के अनुसार केंद्र ने परियोजना में हिमाचल के हितों के संरक्षण पर सहमति जताई है और बिजली घटक की करीब 2,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत का अतिरिक्त वित्तीय बोझ प्रदेश पर नहीं पड़ेगा। परियोजना तैयार होने के बाद हिमाचल को सालाना 1,000 मिलियन यूनिट बिजली की हिस्सेदारी मिलने और इससे 1,000 करोड़ रुपये से अधिक वार्षिक आय होने की संभावना है।
शिमला
छह राज्यों ने किशाऊ परियोजना के लिए किया समझौता
उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टौंस नदी पर प्रस्तावित किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को धरातल पर उतारने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान ने परियोजना के क्रियान्वयन के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर किए।
समझौते पर केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा ने हस्ताक्षर किए। परियोजना की प्रस्तावित विद्युत उत्पादन क्षमता 422 मेगावाट है।
करीब 2,000 करोड़ रुपये के वित्तीय बोझ से हिमाचल को राहत
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के अनुसार परियोजना के बिजली घटक पर हिमाचल की ओर से करीब 2,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत का मुद्दा लंबे समय से अटका हुआ था। राज्य सरकार लगातार केंद्र के समक्ष यह पक्ष रख रही थी कि हिमाचल के सीमित वित्तीय संसाधनों को देखते हुए इतना बड़ा अतिरिक्त बोझ प्रदेश पर डालना उचित नहीं होगा।
मुख्यमंत्री के मुताबिक 16 जून, 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री की अध्यक्षता में हुई उच्च स्तरीय बैठक में इस विषय पर महत्वपूर्ण सहमति बनी थी। बिजली घटक पर आने वाली हिमाचल की अनुमानित लागत को परियोजना के जल घटक से लाभान्वित होने वाले दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा द्वारा वहन किए जाने पर केंद्र सरकार ने सैद्धांतिक सहमति व्यक्त की थी। अब एमओयू के साथ परियोजना के आगे बढ़ने का रास्ता खुल गया है।
पिछली सरकार के 800 करोड़ रुपये के प्रस्ताव को वर्तमान सरकार ने किया था अस्वीकार
मुख्यमंत्री ने कहा कि पिछली प्रदेश सरकार ने परियोजना में हिमाचल की ओर से 800 करोड़ रुपये की वित्तीय हिस्सेदारी देने पर सहमति जताई थी। वर्तमान सरकार ने राज्य की वित्तीय स्थिति और सीमित संसाधनों को देखते हुए इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया और केंद्र के समक्ष हिमाचल के हितों का पक्ष दोबारा मजबूती से रखा।
प्रदेश सरकार का तर्क था कि परियोजना के जल घटक के लिए केंद्र सरकार 90 प्रतिशत अनुदान उपलब्ध करवा रही है, ऐसे में बिजली घटक के लिए भी हिमाचल पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव नहीं डाला जाना चाहिए। सरकार ने परियोजना से होने वाले विस्थापन और हिमाचल के संबंधित क्षेत्र पर पड़ने वाले प्रभाव को भी केंद्र के समक्ष प्रमुखता से रखा।
हर साल 1,000 मिलियन यूनिट बिजली की हिस्सेदारी
किशाऊ परियोजना से हिमाचल को मिलने वाला आर्थिक लाभ भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मुख्यमंत्री के अनुसार परियोजना के बिजली घटक से प्रदेश को प्रतिवर्ष 1,000 मिलियन यूनिट बिजली की हिस्सेदारी प्राप्त होगी। इससे प्रदेश को सालाना 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की आय होने की संभावना है।
राज्य सरकार का मानना है कि प्रदेश के मौजूदा सीमित वित्तीय संसाधनों के बीच इतनी बड़ी वार्षिक आय हिमाचल की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। परियोजना में राज्य की बिजली हिस्सेदारी सुरक्षित रहने के साथ अतिरिक्त वित्तीय बोझ से राहत को सरकार प्रदेश के लिए बड़ी उपलब्धि के रूप में देख रही है।
विस्थापन और नुकसान का मुद्दा भी केंद्र के सामने रखा
मुख्यमंत्री ने कहा कि किशाऊ परियोजना के निर्माण के कारण हिमाचल के संबंधित क्षेत्र की आबादी को विस्थापन का सामना करना पड़ेगा और परियोजना का महत्वपूर्ण प्रभाव प्रदेश पर पड़ेगा। ऐसे में राज्य सरकार ने केंद्र के समक्ष स्पष्ट किया कि हिमाचल पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने के बजाय राष्ट्र की प्रगति में प्रदेश के योगदान की उचित भरपाई होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार विभिन्न मंचों पर हिमाचल के अधिकारों और हितों को लगातार उठा रही है। किशाऊ परियोजना में राज्य की उचित हिस्सेदारी और वित्तीय हितों का संरक्षण इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। एमओयू के दौरान मुख्य सचिव के.के. पंत और अतिरिक्त मुख्य सचिव आर.डी. नजीम भी उपस्थित रहे।