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अब सवाल सिर्फ हादसे का नहीं, 1352 करोड़ की जवाबदेही का है

Shailesh Saini • 48 Mins Ago • 1 Min Read

एक टैंकर पलटा और आठ घंटे तक सड़क बंद रही, तो सवाल उठना लाजिमी—आपदा प्रबंधन से लेकर निर्माण गुणवत्ता तक किसकी जिम्मेदारी?

हिमाचल नाऊ न्यूज शिलाई

बड़वास की घटना ने राष्ट्रीय राजमार्ग-707 की जवाबदेही व्यवस्था पर सीधे सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि एक टैंकर के सड़क पर पलटने के बाद करीब आठ घंटे तक यातायात बाधित रहा, तो सवाल यह है कि राष्ट्रीय राजमार्ग जैसे महत्वपूर्ण मार्ग के लिए आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र आखिर कितना तैयार है?क्या इस मार्ग पर दुर्घटना के बाद तत्काल पहुंचने वाली क्रेन और भारी वाहनों को हटाने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं?

अगर उपलब्ध हैं तो वे मौके पर पहुंचने में इतना समय क्यों लगा? और यदि उपलब्ध नहीं हैं तो 1352 करोड़ रुपये की लागत वाले इस महत्वपूर्ण कॉरिडोर की आपदा प्रबंधन योजना आखिर कहां है?मंत्रालय से पूछा जाना चाहिए—सड़क बनी तो सुरक्षा का ऑडिट किसने किया?जब सड़क निर्माण पर इतनी बड़ी राशि खर्च हुई तो निर्माण पूरा होने के बाद इसकी तकनीकी गुणवत्ता और यातायात सुरक्षा का स्वतंत्र ऑडिट किस एजेंसी ने किया?

क्या पूरे मार्ग की ढाल, मोड़, चढ़ाई, सड़क की चौड़ाई, जल निकासी, सुरक्षा अवरोध और भारी वाहनों की आवाजाही को लेकर कोई विस्तृत सुरक्षा ऑडिट हुआ है?

यदि हुआ है तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?

और यदि ऐसा ऑडिट नहीं हुआ तो इतने महत्वपूर्ण राष्ट्रीय राजमार्ग को बिना व्यापक स्वतंत्र सुरक्षा परीक्षण के यातायात के लिए कैसे इस्तेमाल किया गया?

निर्माण एजेंसी से भी पूछा जाना चाहिए हिसाब

सड़क का निर्माण करने वाली कंपनियों को भुगतान किस आधार पर किया गया? निर्माण सामग्री और सड़क की गुणवत्ता की जांच किस स्तर पर हुई? गुणवत्ता जांच के लिए लिए गए नमूनों की रिपोर्ट क्या रही? जिन हिस्सों को लेकर लगातार स्थानीय शिकायतें सामने आती रही हैं,

वहां विभाग ने अब तक क्या कार्रवाई की?यदि जांच में सड़क के डिजाइन या निर्माण में कोई तकनीकी कमी सामने आती है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी—निर्माण एजेंसी की, सलाहकार की, गुणवत्ता जांच करने वाली एजेंसी की या संबंधित विभाग की?

करोड़ों की सड़क के रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी?

अब जब राष्ट्रीय राजमार्ग का संबंधित हिस्सा हिमाचल प्रदेश लोक निर्माण विभाग के राष्ट्रीय राजमार्ग मंडल को सौंपा जा चुका है, तो एक और सवाल सामने है—सड़क की वर्तमान स्थिति के लिए जवाबदेह कौन है?किस विभाग ने सड़क का हस्तांतरण किस स्थिति में स्वीकार किया?

क्या हस्तांतरण से पहले सड़क का विस्तृत तकनीकी निरीक्षण हुआ था? क्या निर्माण में पाई गई कमियों को सूचीबद्ध किया गया था? यदि कमियां थीं तो उन्हें दूर करने की जिम्मेदारी किसकी तय हुई?

आठ घंटे का जाम सिर्फ यातायात समस्या नहीं

बड़वास में आठ घंटे तक सैकड़ों वाहन फंसे रहे। इनमें बसें, ट्रक, निजी वाहन और मरीजों को ले जाने वाली एंबुलेंस भी शामिल होने की बात सामने आई है। ऐसे में सवाल यह भी है कि राष्ट्रीय राजमार्ग प्रशासन के पास वैकल्पिक यातायात मार्ग और आपातकालीन डायवर्जन की कोई प्रभावी योजना है या नहीं?क्या संवेदनशील स्थानों की पहचान पहले से की गई है? क्या वहां दुर्घटना की स्थिति में यातायात को तत्काल दूसरी सड़क पर मोड़ने की व्यवस्था है?

अब कागजी जांच नहीं, सार्वजनिक जवाब चाहिए

बड़वास की घटना के बाद स्थानीय लोगों की मांग केवल सड़क खोलने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। अब सरकार और संबंधित विभाग को यह बताना होगा कि राष्ट्रीय राजमार्ग-707 की सुरक्षा और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्था है।1352 करोड़ रुपये की सड़क में यदि तकनीकी खामी है तो उसे कौन ठीक करेगा?

यदि निर्माण सही है तो हादसे के बाद यातायात व्यवस्था क्यों चरमराई?यदि आपातकालीन व्यवस्था मौजूद है तो क्रेन को मौके तक पहुंचने में इतना समय क्यों लगा?यदि सड़क सुरक्षित है तो संवेदनशील हिस्सों पर बार-बार सवाल क्यों उठ रहे हैं?और यदि शिकायतें गलत हैं तो सरकार स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट सार्वजनिक क्यों नहीं करती?बड़वास की घटना इन सवालों का जवाब मांग रही है।

अब मामला सिर्फ एक टैंकर हटाकर सड़क खोल देने का नहीं है। मामला उस पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का है, जिसके तहत जनता के पैसे से 1352 करोड़ रुपये खर्च कर एक राष्ट्रीय राजमार्ग बनाया गया है।